मुख्तार अब्बास नकवी। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की चुनावी व्यवस्था सियासी सवालों के समुद्र में ग़ोता खा रही है, चुनाव में 'वोट की चोट को चुनाव तंत्र की खोट, साबित करने की सियासी सनक संसद से सड़क तक चरम पर है ।

आजादी के बाद तमाम तरह के चुनौतीपूर्ण माहौल में 18 लोकसभा के आम चुनाव और विभिन्न प्रदेशों-केंद्र शासित राज्यों के विधान सभा सदस्यों के चुनाव सफलतापूर्वक सम्पन्न कराने का कीर्तिमान स्थापित करने वाला चुनाव आयोग 'वोट चोरी की अफवाह सीना जोरी की अराजकता, का शिकार क्यों है?

स्वतन्त्रा, निष्पक्षता, लोकतांत्रिक, संवैधानिक जवाबदेही के सूत्र में बांध कर, संविधान के अनुच्छेद 324 से 329 के तहत, 25 जनवरी 1950 को स्वायत्त, संवैधानिक संस्था "चुनाव आयोग" का गठन उसके कर्तव्य, अधिकार आदि की संवैधानिक जिम्मेदारी- जवाबदेही सुनिश्चित करते हुए हुआ। 1989 से पहले आयोग एक सदस्यीय था, जो 1989 के बाद तीन सदस्यीय बना। संविधान और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम आयोग का धर्मग्रंथ है ।

जनादेश की चोट को चुनाव की खोट बनाने के पीछे कितनी हकीकत और कितना फ़साना है समझने के लिए हमें भारत में हए अब तक के निर्वाचन और चुनाव आयोग के इतिहास और वर्तमान को बारीकी से समझना होगा,

1950 में गठित नये -नवेले चुनाव आयोग की आज़ादी के बाद पहले लोकसभा और विधान सभा चुनाव कराने की चुनौतीपूर्ण परीक्षा 1952 के आम चुनाव से शुरू होती है, जब वोटर लिस्ट, पोलिंग बूथ, बैलट पेपर, बैलट बाक्स, मतदान कर्मी सब कुछ नये और अनाड़ी थे, कठोर जलवायु परिस्थितयां, भौगोलिक चुनौती में मतदाता कैसे मतदान करेगा, बूथ कर्मी कैसे मतदान कराएंगे, सब कुछ प्रयोग था, 36 करोड़ से अधिक आबादी के 17 करोड़ से अधिक 21 बर्ष से ऊपर के मतदाताओं वाली 489 लोकसभा सीटों और अधिकांश राज्यों के विधान सभा के लिए हुए, 68 चरण के चुनाव में सबकुछ पहली बार करना था, 380,000 रिम पेपर से बैलट पेपर छपाई, लाखों हर उम्मीदवार के लिए अलग-अलग रंग के साढ़े सात लाख बैलट बाक्स, मतदान के बाद उंगली पर लगने वाली तीन लाख से अधिक स्याही पैकेट, लाखों ठप्पा लगाने की मुहर, सील करने का वैक्स या लाख, ढाई लाख से अधिक पोलिंग बूथ, जिनमें 27,527 बूथ महिला मतदानओं के लिए थे, लाखों मतदान अधिकारी, कर्मी, दूरदराज के संसाधनों, सुविधाओं से मुक्त इलाकों में पोलिंग पार्टी और मतदाताओं के मतदान केंद्र तक पहुंचाने के लिए अस्थाई सड़क, पुल का निर्माण, अधिकांश मतदाताओं मे साक्षरता की कमीं के चलते मतदाताओं को वोटिंग के प्रति प्रशिक्षण, जागरूकता अभियान, बड़ा और कड़ा काम था, पर भारत के लोगों की लोकतंत्र की ललक और जनतंत्र के जुनून से इस प्रयोगात्मक परीक्षा में भी भारत ने अव्वल आकर इस नये- नवेले जनतंत्र ने दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बना दिया ।

जनतंत्र के उत्सव में देश के तमाम पिछड़े, सुविधाहीन क्षेत्रों ने तो कमाल किया था, चाहे 8000 मील में फैला विशाल मीजो हिल रहा हो या राजस्थान का रेगिस्तान या उड़ीसा का आदिवासी क्षेत्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल के बिजली, पानी, सड़क से वंचित इलाके रहें हों या साउथ के समुद्री क्षेत्र, सभी जगह लोग नाचते गाते, उमंग उत्साह के साथ जनतंत्र का जश्न मनाते ऊंट, बैलगाड़ियों, नावों, टांगो, पैदल मीलों चल वोटिंग करने पहुंचे, दुनिया स्तब्ध थी कि इतने बड़े भौगोलिक क्षेत्र में फैले अलग-अलग भाषा, धर्म, रहन-सहन, विपरीत जलवायु वाला विश्व जनसंख्या का छठा भाग सफलता के साथ कैसे इतने बड़े चुनाव को 45% से अधिक मतदान के साथ सफलतापूर्वक सम्पन्न करा लिया?

68 चरणों में 25 अक्टूबर 1951 से 27 मार्च 1952 तक चले चुनाव में 4500 लोकसभा, विधान सभा सीटों के लिए हुई वोटिंग में 489 लोकसभा सीटें बाकी विभिन्न राज्यों की विधान सभा सीटें थीं, कांग्रेस, कम्युनिस्ट, जनसंघ, फारवर्ड ब्लाक, अकाली दल, किसान मजदूर प्रजा पार्टी, शेड्यूल कास्ट फेडरेशन, राम राज्य परिषद, हिन्दू महासभा, जमींदार पार्टी, मुस्लिम लीग, रिपब्लिकन पार्टी सहित 53 से अधिक राजनैतिक दलों और निर्दलीय 1874 उम्मीदवार चुनाव मैदान में रहे, 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं ने 45% से अधिक मतदान किया, मतदान का प्रतिशत अगले चुनाव 1957 में 46% और 1962 में 56%, 1967 में 61% का रिकार्ड बनाते भारतीय लोकतंत्र परिपक्व, प्रमाणिक, प्रगति का प्रतीक बन आगे बढ़ता रहा।

पहले आम चुनाव में कुल 489 सीटों में 86 सीटों पर दो सांसद, जिनमें एक सामान्य एक अनुसूचित जाति, जनजातिय का चुना गया, इसमें नेहरु जी का फूलपुर लोकसभा क्षेत्र भी था, जहां से नेहरु जी और मसुरियादीन जी जीते, एक सीट नार्थ बंगाल की थी जहां से तीन सांसद चुने गए, सीटों की संवैधानिक आरक्षण व्यवस्था तब तक नहीं हो पाने के कारण यह अस्थाई व्यवस्था 1957 के चुनाव तक चली ।

सफल चुनाव के बाद आज़ाद भारत की पहली लोकसभा 17 अप्रैल 1952 को गठित होने के साथ भारतीय लोकतंत्र के संसदीय सफ़र की शानदार शुरुआत हुई ।

1952 से 2026 तक का चुनाव आयोग का सफ़र, चुनाव सुधार, मतदाता पहचान पत्र, नए मतदाताओं का पंजीकरण, मतदान सरलीकरण, मतदान के लिए मतदाताओं में जागरूकता, बोनाफाइड वोटर की सुरक्षा, बोगस वोटर की समीक्षा के साथ आगे बढ़ता रहा । इसी कालखंड में लोकसभा, विधान सभा सीटों का परिसीमन भी हुआ । भौगोलिक औेर जनसंख्या के मद्देनज़र लोकसभा, विधान सभा क्षेत्रों का स्वरूप बदला ।

इस दौरान कुछ चुनाव आयुक्तों की निष्पक्षता, कार्यकुशलता की प्रशंसा हुई तो वहीं कुछ की कार्यशैली पर प्रश्न भी उठते रहे, जाने अनजाने में उनका आचरण चुनाव आयोग की संवैधानिक प्रतिबद्धता, विश्वसनीयता पर बट्टा लगाता रहा, पहले चुनाव आयुक्त से लेकर 26वें मुख्य चुनाव आयुक्त का आकलन करें तो, जहां पहले और दूसरे चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन औेर के. सुंदरम, अपनी कार्यकुशलता के लिए पद्म विभूषण से सम्मानित हुए, वहीं तीसरे एस. के. सेन वर्मा बेहतरीन चुनाव प्रबंधन के लिए याद किए जाते हैं, चौथे आयुक्त नागेंद्र सिंह कुशल और निष्पक्ष प्रशासन के चलते अंतराष्ट्रीय न्यायालय के अध्यक्ष और संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रतिनिधि बने, पांचवे और छठे आयुक्तो स्वामीनाथन और शकधर का कार्यकाल बेहतरीन और निर्विवाद रहा, सातवें रामकृष्ण त्रिवेदी बाद मे गुजरात के राज्यपाल बनाए गए, आठवें पेरी शास्त्री के समय कई बड़े सुधार जिनमें मतदान की आयु 18 वर्ष, ईवीएम की शुरुआत, और उन्ही के समय में सरकार ने चुनाव आयोग को एक सदस्यीय से तीन सदस्यीय बनाया, 9वीं आयुक्त श्रीमती रमादेवी बाद में गुजरात और हिमाचल की राज्यपाल बनाई गई, यादगार कार्यकाल के लिए जाने जाने वाले 10वें टी. एन. शेषन सेवानिवृत्त के बाद काग्रेस में शामिल होकर गुजरात से चुनाव लड़े, ग्यारहवें गिल साहब सीधे कांग्रेस में शामिल होकर मंत्री बने, बारह से 24 तक के मुख्य चुनाव आयुक्त सर्वश्री लिंगदोह, कृष्णा मूर्ती, ब्रिज टंडन, गोपास्वामी, नवीन चावला, याकूब कुरैशी, सुंदर संपत, हरिशंकर ब्रह्मा, नसीम जैदी, अचल ज्योति, ओ. पी. रावत, सुनील अरोड़ा, सुशील कुमार किसी बड़े विवाद से बचे रहे, पच्चीस वें और छब्बीस वें मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार और ज्ञानेश कुमार विपक्ष के निशाने पर रहे,

कई चुनाव आयुक्तों का रिटायर्मेंट के बाद सीधे राजनैतिक दलों से जुड़कर मंत्री, राज्यपाल या सरकारी संस्थानों मे नियुक्त होना आयोग की धाक-धमक को छड़िक धक्का लगाती रही, चुनाव के बैटल युग में बुलेट बाहुबलियों की बकैती और बैलेट बाक्स लूट की दबंगई का दौर भी देश ने देखा है, मतदाताओं की लाइन लगी रहती थी, मतदान पूरा हो जाता था, मतगणना में मतपत्रों की इधर की गड्डी उधर गिनाई का गड़बड़झाला आम बात थी, इन सबके बावजूद चुनाव आयोग और चुनावी व्यवस्था की निष्पक्षता पर कमोबेश भरोसा कायम रहा, 1977 के बाद अधिकांश विधान सभाओं के चुनाव लोकसभा से अलग-अलग अलग होने से चुनाव आयोग की जिम्मेदारी, जवाबदारी बढ़ती गयी, 1952 चुनाव में 17 करोड़ से अधिक वोटर का भारत, आज 2025 में 100 करोड़ के ईद गिर्द मतदाताओं का देश हो चुका है, ढाई लाख पोलिंग केंद्र आज 11 लाख से अधिक मतदान केंद्र में बदल चुके हैं, लाखों रिम पेपर पर छपने वाले बैलट पेपर, लाखों बैलेट बाक्स, तीन लाख से अधिक स्याही पैकेट, लाखों ठप्पा मुहर की जगह आज 55 लाख से ज्यादा ईवीएम-वीवीपैट मशीनें ले चुका है, चुनाव आयोग के सीमित अधिकार और प्रशासनिक ताक़त वक्त के साथ बढ़ती गई, चुनाव घोषित होते ही स्थानीय प्रशासन की नकेल चुनाव आयोग के हाथों में आ जाती है ।

चुनाव आयोग को लेकर सवाल और बवाल का दौर 2014 के चुनाव के बाद शुरू हुआ, पांच दशको से अधिक समय तक अपने को सत्ता की स्वभाविक पार्टी कहने वाली कांग्रेस, पहली गैर-कांग्रेस सरकार के निरन्तरता के साथ तीसरे कार्यकाल में प्रवेश और हार की हैट्रिक को हज़म नहीं कर पाई, कांग्रेस का सिद्धांत रहा कि या तो कांग्रेस को पावर नहीं तो दूसरों के लिए परेशानी का टावर खड़ा करो, 1952 में कांग्रेस 489 में 364 सीटें और 45% वोट हासिल करती है,1957 में 371 सीट 48% वोट, 1962 में 361 सीट 45% वोट, 1967 में 520 में 283 सीट और 41% वोट, 1971 में 352 सीट और 44% वोट, 1980 में 353 सीट और 42% वोट, 1984 में 414 सीट और 48% वोट हासिल करने वाली कांग्रेस की बम्पर सीट और वोट पर विपक्ष ने कभी सवाल नहीं उठाए कभी नहीं कहा कि सरकार बेईमानी या वोट चोरी से बनी है, कुछ चुनाव आयुक्तों, मुख्य चुनाव आयुक्तों के सेवानिवृत्त के बाद केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, सरकारी संस्थानों मे नियुक्त के बावजूद कभी चुनाव आयोग की निष्पक्षता, विश्वसनीयता पर सवाल नहीं किया, सभी ने जनादेश को स्वीकार और सलाम किया ।

उस दौर का भी देश गवाह है जब 1989, 1996, 1998, 1999, 2004, 2009, 2014, 2019, 2024 चुनावों में सत्ता की स्वभाविक पार्टी समझने वाली ग्रांड ओल्ड पार्टी बिना जनाधार की जागीरदारी बिना, बिना जमीन की जमींदारी के गुरूर सुरूर में, केंद्र और राज्यों में सिमटती सिकुड़ती गई, वहीं भाजपा 2014, 2019, 2024 के चुनाव में अकेले क्रमशः 282 सीट और 38% वोट, 303 सीट और 38% वोट, 240 सीट और 37% वोट हासिल कर श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में निरंतरता के साथ बिना कांग्रेस के सपोर्ट, रहम-रिमोट के तीसरे कार्यकाल में प्रवेश कर गई, चुनाव में लगी चोट को चुनाव तंत्र की खोट साबित करने की सोंच, सनक, साज़िश, सियासत ने हार की हताशा ने कांग्रेस को हुड़दंगी तमाशा बना दिया है। हर चुनाव राजनैतिक दलों के लिए सबक-संदेश होता है, कोई भी हार जीत स्थाई नहीं होती, जनतंत्र में जनादेश की ताकत को अहंकार, अराजकता की आफत से अपहरण करने की सनक सियासी सेहत के लिए हानिकारक होती है ।

मुख्तार अब्बास नकवी
लेखक, भाजपा के केंद्रीय चुनाव सुधार समिति के अध्यक्ष, राष्ट्रीय महासचिव और केंद्रीय कैबिनेट मिनिस्टर रहे हैं ।