संजय गुप्त। संसद का मानसून सत्र अत्यधिक शोर-शराबे, हंगामे और आरोप-प्रत्यारोप की भेंट चढ़ गया। किसी न किसी मुद्दे को तूल देकर राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने संसद नहीं चलने दी। पहले इसके लिए मुद्दा बनाया गया नीट पेपर लीक मामले को। इस मामले को लेकर काकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के साथ संसद मार्च का आयोजन किया।

इस मार्च को संसद जाने से रोकने के लिए पुलिस ने जो बल प्रयोग किया, उसे विपक्ष ने संसद ठप करने का जरिया बना लिया। वैसे तो संसद पहले भी बाधित होती रही है और उसके सत्र अनुत्पादक होते रहे हैं, लेकिन इस बार उसका प्रदर्शन कहीं अधिक निराशाजनक रहा। हालांकि शोर-शराबे के बीच सरकार दस से अधिक विधेयक पारित कराने में सफल रही, लेकिन इनमें से केवल पेपर लीक कानून में संशोधन वाले विधेयक पर चर्चा हो सकी। यह चर्चा भी इस विधेयक के प्रविधानों पर केंद्रित नहीं रही।

कहना कठिन है कि चर्चा के अभाव में जो विधेयक पारित हुए और कानून बनने जा रहे हैं, वे कसौटी पर खरे उतरेंगे। इसकी अनदेखी न की जाए कि पेपर लीक कानून में 2024 में भी संशोधन किए गए थे। यदि दो वर्ष बाद ही उसमें फिर से संशोधन करने की आवश्यकता पड़ी तो इसका अर्थ है कि पहले के संशोधन पर्याप्त नहीं थे।

राहुल गांधी एवं अन्य विपक्षी नेता संसद के न चल पाने और कई विधेयकों के पेश न हो पाने को अपनी जीत मान रहे हैं, लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि जनता की याददाश्त कमजोर होती है और वह संसद के भीतर-बाहर होने वाले हंगामे को तो बिल्कुल भी याद नहीं रखती। जनता यह अच्छी तरह समझ रही है कि संसद के इस सत्र में उसके हित से जुड़े मुद्दों पर कहीं कोई चर्चा नहीं हुई। उसे यह भी पता नहीं कि जो विधेयक पारित हुए उनमें क्या था और उनसे उसे क्या लाभ मिलने वाला है? अब यदि संसद में जनहित के मुद्दों पर चर्चा ही नहीं होगी तो जनता को निराशा ही हाथ लगेगी।

संसद में चर्चा के गिरते स्तर से आम जनता और विशेष रूप से जेन-जी पीढ़ी के बीच कुछ ऐसा संदेश जा रहा है कि संसद को न चलने देना विपक्ष का एक आवश्यक लोकतांत्रिक कार्य है और यह उसे करना ही चाहिए। यह एक गलत धारणा और संसदीय लोकतंत्र की मर्यादा के खिलाफ है। यदि संसद में सार्थक चर्चा नहीं होगी तो वह अपनी महत्ता खो देगी। आज यह आवश्यक है कि संसद को सही तरीके से संचालित करने के नियम नए सिरे से बनाए जाएं।

यदि ऐसा नहीं किया जाता तो राहुल गांधी सरीखे उन नेताओं को बल मिलेगा, जो यह समझ बैठे हैं कि कठोर भाषा बोलने और अनर्गल आरोप लगाने से वे राजनीतिक रूप से मजबूत हो रहे हैं। वास्तव में यह भ्रांति ही राहुल गांधी की राजनीतिक असफलता का कारण है। वे इसे समझने के बजाय और अधिक गैर-जिम्मेदाराना राजनीति का परिचय दे रहे हैं। पिछले दिनों उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के खिलाफ अशालीन भाषा का उपयोग किया। उन्हें पता होना चाहिए कि उनके ऐसे आचरण से उन्हें ही नुकसान होता है और उनकी अशालीन भाषा का इस्तेमाल भाजपा अपने पक्ष में करने मे सफल रहती है।

कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल एक अरसे से संसद में हंगामा करने की रणनीति पर ही चल रहे हैं। अब स्थिति यह है कि यदि सरकार किसी मुद्दे पर चर्चा के लिए तैयार हो जाती है तो विपक्ष उससे कन्नी काट लेता है या कोई और मांग लेकर सामने आ जाता है। इसके नतीजे में आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति शुरू हो जाती है। राजनीतिक दलों को इस पर विचार करना होगा कि निरर्थक चर्चा से खुद उन्हें और समाज को क्या हासिल हो रहा है?

संसद तो होती ही इसलिए है कि वहां पर कानून बनाने का काम सही तरीके से हो और राष्ट्रीय महत्व के मुद्दों पर देश को दिशा देने वाली चर्चा हो, लेकिन अब ऐसा कठिनाई से ही होता है। मानसून सत्र में विपक्ष किस तरह संसद को बाधित करने पर आमादा था, इसका पता इससे चलता है कि राहुल गांधी सीजेपी के संसद मार्च में पुलिस के बल प्रयोग पर गृहमंत्री अमित शाह के वक्तव्य की मांग पर अड़ गए और जब वे इसके लिए तैयार हो गए तो उन्होंने यह कहकर इन्कार कर दिया कि उन्हें उनका भाषण नहीं सुनना। समझना कठिन है कि वे एवं अन्य विपक्षी नेता चाहते क्या थे?

उन्हें यह पता होना चाहिए कि किसी मामले पर निरर्थक चर्चा से स्थितियां बदलती नहीं-न तो कोई कानून बनता है और न ही आम जनता की समस्याओं का समाधान होता है। संसद में चर्चा के नाम पर एक-दूसरे पर सतही आरोप-प्रत्यारोप से लोकतंत्र कमजोर ही हो रहा है। अब संसद में किसी विधेयक की बारीकियों पर मुश्किल से ही ढंग की चर्चा होती है। संसद में तार्किक ढंग से अपनी बात कहने वाले सांसद भी कम होते जा रहे हैं। जो हैं, वे हंगामा करने वाले सांसदों के आगे असहाय से दिखते हैं। समस्या यह भी है कि अब औसत सांसदों को यह लगने लगा है कि धीर-गंभीर चर्चा से उन्हें चुनाव जीतने में कोई सहायता नहीं मिलने वाली। चूंकि हंगामा करके वे सुर्खियों में आ जाते हैं, इसलिए वे ऐसा करना ही पसंद करते हैं।

इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि कई विधेयकों पर विचार-विमर्श के लिए उन्हें संसदीय समितियों के पास भेज दिया जाता है, जैसे विदेशी दान विनियमन अधिनियम यानी एफसीआरए विधेयक को भेजा गया, क्योंकि बहुत कम यह देखने को मिलता है कि संसदीय समितियों में ढंग से कोई चर्चा हुई और उसके नतीजे में बेहतर कानून बना। यह एक तथ्य है कि एफसीआरए संसदीय समिति को इसलिए भेजना पड़ा, क्योंकि विपक्ष उस पर बहस करने के बजाय उसे वापस लेने की जिद कर रहा था।

देश ने गत दिवस अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मनाया, लेकिन हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि संसद में लोकतंत्र की बुनियाद मजबूत होती नहीं दिख रही है। इसके बजाय वह कमजोर होती दिख रही है। सच यह है कि इसे जानबूझकर कमजोर किया जा रहा है। संसद में देश की समस्याओं पर सार्थक ढंग से चर्चा करके समाज को दिशा देने अथवा कानून बनाने का काम प्राथमिकता से बाहर होना संसदीय लोकतंत्र के लिए गंभीर चिंता का कारण बनना चाहिए-सत्तापक्ष और विपक्ष के साथ-साथ समाज के लिए भी।