विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी एफसीआरए में संशोधन वाले विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति में भेजने से पक्ष-विपक्ष के बीच सहमति बनने के आसार कम ही हैं, क्योंकि विपक्षी दल इसे वापस लेने की मांग पर अड़े थे। इस कानून में संशोधन पर विपक्ष के साथ अमेरिकी सांसद को भी आपत्ति थी। इसके अतिरिक्त ईसाई संगठन भी इस कानून में संशोधन-परिवर्तन के खिलाफ थे।

उचित यही होता कि सरकार इस विधेयक पर संसद में चर्चा कराने को प्राथमिकता देती और फिर आवश्यक समझती तो उसे जेपीसी को भेजती। बिना किसी चर्चा के इस विधेयक को जेपीसी भेजने से ऐसा लग रहा है कि सरकार किसी दबाव में आ गई। जो भी हो, किसी कानून में संशोधन सरकार का अधिकार है। विपक्ष प्रस्तावित संशोधनों पर अपनी आपत्ति जता सकता है, लेकिन वह इस पर अड़ नहीं सकता कि संशोधन किया ही न जाए।

आखिर इसके पहले भी एफसीआरए में संशोधन किया गया है और यह इसलिए किया गया था कि कुछ गैर-सरकारी संगठन विदेशी धन के बल पर पर्यावरण संरक्षण की आड़ में विकास विरोधी हरकतें करते हुए पाए गए थे। एफसीआरए यह तय करता है कि एनजीओ, ट्रस्ट आदि विदेश से प्राप्त दान किन उद्देश्यों पर खर्च कर रहा है। एफसीआरए यह भी सुनिश्चित करता है कि विदेशी फंडिंग का इस्तेमाल देश की संप्रभुता, सुरक्षा और आंतरिक शांति के विरुद्ध न होने पाए।

हालांकि एफसीआरए में यह प्रविधान है कि राजनीतिक दल, नेता, उम्मीदवार, जज, सरकारी कर्मचारी आदि विदेशी चंदा प्राप्त नहीं कर सकते, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि कई संस्थाएं यह स्पष्ट करने से इन्कार करती हैं कि उन्होंने विदेश से मिले पैसे किस मद में खर्च किए? ऐसे भी मामले सामने आ चुके हैं कि दान जिस उद्देश्य से लिया गया, उसे खर्च किसी अन्य मकसद के लिए किया गया। इससे भी चिंताजनक यह है कि विदेशी धन पाने वाली कई संस्थाएं राष्ट्रीय हितों के विरुद्ध काम करती हुई पाई गई हैं।

क्या यह किसी से छिपा है कि कुडनकुलम परमाणु परियोजना के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करने वाले संगठन ऐसा ही करते पाए गए थे? यह निष्कर्ष उस संप्रग सरकार का था, जिसका नेतृत्व कांग्रेस कर रही थी। क्या यह विडंबना नहीं कि आज यही कांग्रेस एफसीआरए में संशोधन के खिलाफ है? देश में कार्यरत एनजीओ एक तरह का उद्यम बन गए हैं।

कई एनजीओ संदिग्ध चरित्र वाले हैं और उन पर देश हित विरोधी कार्यों और खासकर विकास विरोधी माहौल बनाने तथा मतांतरण में लिप्त होने के आरोप लगते रहे हैं। इसे देखते हुए एफसीआरए में उपयुक्त संशोधन किए ही जाने चाहिए। इसलिए और भी, क्योंकि संप्रभु देश को यह सुनिश्चित करने का अधिकार है कि विदेशी धन का दुरुपयोग न होने पाए।