विचार: सुधार की मांग करता लोकतंत्र
विपक्ष को समझना होगा कि जनता की रुचि इसमें नहीं है कि आप मोदी सरकार को हटाएं, उसकी रुचि इसमें अधिक होगी कि आप उससे बेहतर क्या करेंगे?
HighLights
राजनीतिक संस्कृति में गिरावट, जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही पर गंभीर सवाल।
सत्ता-विपक्ष में संवादहीनता, रचनात्मक संसदीय बहस का अभाव।
लोकतंत्र को व्यवस्था परिवर्तन की दरकार, केवल सत्ता परिवर्तन नहीं।
डॉ. एके वर्मा। बिहार, मध्य प्रदेश और गुजरात में एक-एक विधानसभा सीटों के उपचुनावों में तीन राजनीतिक दलों को सफलता प्राप्त हुई। बिहार की बांकीपुर में जन सुराज पार्टी की जीत से इस दल की बोहनी हुई तो मध्य प्रदेश की दतिया को कांग्रेस और गुजरात की मांजलपुर को भाजपा ने अपने पास बरकरार रखा। यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रतीक है और चुनावों की शुचिता का संकेत भी। चुनाव ही सरकार चुनने का लोकतांत्रिक तरीका है।
लोकतंत्र तो एक व्यवस्था है, जिसमें नीतियों और कानूनों का निर्माण, विकास परियोजनाएं, लोक कल्याण के प्रतिमान, वित्तीय संसाधन जुटाने और उनके समुचित प्रयोग तथा सुरक्षा और प्रतिरक्षा व्यवस्थाओं को बनाने में जनप्रतिनिधियों के माध्यम से जन भावनाओं के अनुरूप निर्णय लिए जाने चाहिए। जनता को अपने जनप्रतिनिधियों से बहुत अपेक्षाएं होती हैं, चाहे वे सत्तापक्ष के हों या विपक्ष के। हालांकि विगत 75-76 वर्षों में राजनीतिक संस्कृति में लगातार गिरावट आई है और जनप्रतिनिधियों ने जनता को निराश किया है।
लोकतांत्रिक सरकारें जनता के प्रति उत्तरदायी होती हैं, भले ही जनता को आगामी चुनावों तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। वैसे भी लोकतंत्र में सरकारें जनप्रतिनिधियों के माध्यम से जनता के प्रति दैनिक आधार पर उत्तरदायी होती हैं, क्योंकि उन्हें सरकार से प्रश्न पूछने, जनहित के मुद्दे उठाने, सरकार के विरुद्ध निंदा और अविश्वास प्रस्ताव लाने का अधिकार है। वे सदन में ऐसा कर सकें, इसके लिए संविधान का अनुच्छेद 105 सांसदों और अनुच्छेद 194 विधायकों को सदन में अभिव्यक्ति और मतदान की पूर्ण स्वतंत्रता देता है।
हाल के दौर में लोकतंत्र के मोर्चे पर दो विसंगतियां दिखाई पड़ती हैं। एक, सरकार और विपक्ष में सतत, गंभीर, बौद्धिक और शालीन संवाद का अभाव हो चला है, जिससे संसदीय बहसें और कार्यवाहियां बाधित हो रही है। दूसरा, सत्ता पक्ष के प्रस्तावों पर विपक्ष गंभीर आलोचना करने के बजाय कटाक्ष, उपहास, आरोप, शोर, बहिष्कार आदि का सहारा ले रहा है। इससे संसद परिसर में ही धरना-प्रदर्शन की प्रवृत्ति विकसित हो रही है। वह गंभीरता से कोई वैकल्पिक या रचनात्मक सुझाव देने की स्थिति में नहीं। परिणामस्वरूप, संसदीय बहसों में लोगों की रुचि घटती जा रही है।
एक समय विपक्ष के नेता संख्या में कम होने के बावजूद अपने ज्ञान, बौद्धिकता और प्रभावी अभिव्यक्तियों से सत्ता पक्ष और देश का ध्यान और सम्मान अर्जित करते थे। वह परंपरा अब विलुप्तप्राय है। दलों ने अच्छे और योग्य लोगों को पीछे धकेल, अपराधियों और धनवानों को जिताऊ प्रत्याशी के रूप में आगे कर दिया। निर्वाचन आयोग केवल मतदान प्रतिशत बढ़ाने पर ध्यान देता है और यह प्रयास नहीं करता कि राजनीतिक दल अच्छे और योग्य लोगों को राजनीति में लाएं। बहुत कम विधायक और सांसद बहस के लिए अच्छी तैयारी करके आते हैं। परिणामस्वरूप, महत्वपूर्ण विधेयक शोर-शराबे के बीच बिना गंभीर वाद-विवाद के ऐसे ही पारित जाते हैं।
देश में भाजपा और वामदलों के अलावा अधिकांश दल परिवार केंद्रित राजनीति पर आधारित हैं। कुछ अपवादों को छोड़ अधिकतर दल आंतरिक-लोकतंत्र के अभाव से ग्रस्त हैं। परिणामस्वरूप दलों के अंदर नीतिगत मुद्दों पर सार्थक और प्रभावी रणनीति नहीं बन पाती, जिससे उनके सांसद/विधायक किसी मुद्दे पर तथ्यात्मक और तार्किक विचार नहीं रख पाते। इससे सरकार को बेहतर सुझाव नहीं मिलते। जो विधेयक विस्तृत विमर्श के लिए सर्वदलीय संसदीय समितियों में जाते हैं, वहां भी गुण-दोष के बजाय संभवतः दलीय निष्ठाओं के आधार पर विमर्श होने लगा है।
जनता ने कांग्रेस और भाजपा दोनों सरकारों को परखा है। प्रत्येक सरकार ने कुछ अच्छा काम किया है। उनमें कुछ खामियां भी रही हैं, लेकिन विपक्ष का दायित्व न केवल उन खामियों को रेखांकित करना है, वरन बेहतर विकल्प सुझाना भी है। तभी आगामी चुनावों में जनता विपक्ष को सत्ता सौंपने का मन बनाए। मोदी सरकार में कई बड़े और महत्वपूर्ण काम हुए, विकास हुआ, सुरक्षा-प्रतिरक्षा सुदृढ़ हुई तथा बिगड़ते वैश्विक-परिदृश्य में देश के हितों को सुरक्षित करने की कवायद हुई। यह भी लोकतंत्र की ही कसौटी है कि कोई सरकार कितना भी अच्छा काम करे, उसे आलोचना भी सहनी पड़ेगी और साथ ही साथ जन समर्थन प्राप्त करने के प्रयास भी जारी रखने होंगे।
विपक्ष को समझना होगा कि जनता की रुचि इसमें नहीं है कि आप मोदी सरकार को हटाएं, उसकी रुचि इसमें अधिक होगी कि आप उससे बेहतर क्या करेंगे? ऐसा नहीं कि जनता किसी भी सरकार से शत-प्रतिशत संतुष्ट होती है, लेकिन जब उसे मतदान करना होता है तो वह सरकार और विपक्ष दोनों को तौलती है। आज विपक्ष ‘मोदी-हटाओ’ एजेंडा में इतना लिप्त है कि जनता के सामने अपना सकारात्मक एजेंडा रख ही नहीं पाता। वहीं, सत्तारूढ़ भाजपा की समस्या है कि प्रधानमंत्री मोदी की स्वीकार्यता के पीछे पार्टी के अधिकतर सांसद और विधायक छुपे हुए हैं, जनता से कटे हुए हैं, भ्रष्टाचार में लिप्त हैं और स्थानीय विकास के लिए उनके पास कोई रोडमैप नहीं। कब तक जनता मोदी के नाम पर उन्हें चुनेगी?
प्रधानमंत्री वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर पर कील-कांटे दुरुस्त करने में जुटे हैं, लेकिन स्थानीय स्तर पर तो विधायकों, सांसदों एवं संगठन पदाधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे प्रशासन से संवाद कर समस्याओं का समाधान कराएं और विकास गतिविधियों को आगे बढ़ाएं। कुछ लोग इस स्थिति का लाभ उठाकर ‘देश में अब लोकतंत्र संसद से नहीं, सड़क से तय होगा, चुनाव से नहीं, प्रतिरोध से तय होगा’ जैसी बातें करने लगते हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं कि सड़क और प्रतिरोध से निकला जनादेश अंततः जाएगा तो संसद की ओर ही। फिर भी इस आवश्यकता को अनदेखा नहीं किया जा सकता कि आज लोकतंत्र पुनर्विन्यास मांगता है, क्योंकि जनता को सत्ता-परिवर्तन से अधिक व्यवस्था-परिवर्तन की दरकार है।
(लेखक सेंटर फार द स्टडी आफ सोसायटी एंड पालिटिक्स के निदेशक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)











