जागरण संपादकीय: छात्र हित की अनदेखी
यदि झारखंड सरकार छात्रों का भरोसा हासिल नहीं कर सकी तो इसके लिए वही जिम्मेदार है। वह इसके लिए भी जिम्मेदार है कि छात्रों के आंदोलन को लेकर दलगत राजनीति शुरू हो गई और पुलिस बल प्रयोग भी एक मुद्दा बन गया।
HighLights
रांची में छात्रों के विधानसभा मार्च पर पुलिस बल प्रयोग।
परीक्षाओं में अनियमितता को लेकर छात्रों की सीबीआई जांच मांग।
सरकार की संवेदनहीनता से बढ़ा छात्रों का आक्रोश और आंदोलन।
जब किसी समस्या-शिकायत पर समय रहते सही तरह ध्यान नहीं दिया जाता, तब उसके कैसे नतीजे होते हैं, यह पहले दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च के दौरान देखने को मिला और फिर रांची में छात्रों के विधानसभा मार्च में। दिल्ली की तरह रांची में पुलिस को बल प्रयोग करना पड़ा, क्योंकि भीड़ पुलिस बैरिकेड तोड़कर आगे बढ़ रही थी।
निःसंदेह रांची में छात्रों की भीड़ की तुलना जंतर-मंतर पर सीजेपी के नेतृत्व में जुटी भीड़ से नहीं की जा सकती, क्योंकि दिल्ली में भीड़ में कुछ अराजक तत्व भी शामिल थे। इसके बावजूद इस तथ्य को भी अनदेखा न किया जाए कि पुलिस के पास उस समय बल प्रयोग के अलावा और कोई चारा नहीं रहता, जब कोई समूह किसी निषिद्ध क्षेत्र में जाने की जबरन कोशिश करता है।
समस्या यह है कि जब तक कोई आंदोलनरत समूह शांतिपूर्ण रहता है, तब तक सरकारें उसकी परवाह नहीं करतीं। दिल्ली में संसद मार्च और रांची में विधानसभा के घेराव की नौबत नहीं आती, यदि दोनों जगह सरकारें समय पर सक्रियता और संवेदनशीलता दिखातीं।
रांची में राज्य सरकार की ओर से आयोजित परीक्षाओं में अनियमितता को लेकर झारखंड के छात्र 15 दिनों से अधिक समय से धरना-प्रदर्शन कर रहे थे, लेकिन झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व वाली सरकार तब चेती, जब उसे लगा कि आक्रोशित छात्रों की संख्या बढ़ती जा रही है और वे अपनी मांगों से पीछे हटने वाले नहीं है।
उसने छात्रों के दबाव में उनके प्रतिनिधियों से वार्ता करके यह दावा किया कि उनकी 98 प्रतिशत मांगें मान ली गई हैं, लेकिन छात्र इस दावे को नकार रहे हैं, क्योंकि परीक्षाओं में धांधली की सीबीआइ जांच की उनकी मांग नहीं मानी गई। समझना कठिन है कि जब राज्य सरकार परीक्षाओं में धांधली की जांच कर ही रही है और प्रथमदृष्टया यह सिद्ध हो गया है कि परीक्षाओं में अनियमितता हुई, तब फिर उसे इसकी जांच सीबीआइ से कराने में क्या हर्ज है?
यदि केंद्र सरकार कॉकरोच जनता पार्टी के दबाव में शिक्षा मंत्री का त्यागपत्र ले सकती है, तो झारखंड सरकार परीक्षाओं में गड़बड़ी की सीबीआइ जांच की तार्किक मांग मानने से क्यों इन्कार कर रही है? पता नहीं क्यों सरकारें यह समझने के लिए आसानी से तैयार नहीं होतीं कि जायज मांगों के प्रति केवल संवेदनशील दिखना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि कुछ ठोस कदम भी उठाने पड़ते हैं।
इससे ही आक्रोश शांत होता है और पीड़ित लोगों में न्याय मिलने का भरोसा पैदा होता है। यदि झारखंड सरकार छात्रों का भरोसा हासिल नहीं कर सकी तो इसके लिए वही जिम्मेदार है। वह इसके लिए भी जिम्मेदार है कि छात्रों के आंदोलन को लेकर दलगत राजनीति शुरू हो गई और पुलिस बल प्रयोग भी एक मुद्दा बन गया।











