विचार: खाड़ी पर ऊर्जा निर्भरता के खतरे
असली और स्थायी समाधान ऊर्जा की आत्मनिर्भरता हासिल करने में है, जो स्वच्छ ऊर्जा से ही हासिल हो सकती है।
HighLights
अमेरिकी-ईरान संघर्ष ने होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद कर दिया।
वैश्विक तेल आपूर्ति बाधित, जिससे आर्थिक संकट बढ़ा।
स्वच्छ ऊर्जा ही स्थायी ऊर्जा आत्मनिर्भरता का मार्ग है।
शिवकांत शर्मा। एक पुरानी कहावत है कि नमाज छुड़ाने गए थे, लेकिन रोजे गले पड़ गए। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ यही हुआ। ट्रंप ईरान को परमाणु शक्ति बनने से रोकने चले थे, लेकिन होर्मुज बंद करा बैठे। उन्होंने अमेरिका के साथ-साथ पूरी दुनिया को आर्थिक संकट में डाल दिया। लगभग चार महीनों की बमबारी के बाद ईरान 17 जून को 60 दिनों के युद्धविराम के साथ होर्मुज खोलने पर सहमत हुआ था। इसी दौरान उसके परमाणु निरस्त्रीकरण के साथ-साथ जिहादी गुटों का समर्थन बंद करने पर बातचीत होनी थी, लेकिन मामला होर्मुज किसकी निगरानी और नियंत्रण में रहे, इसी पर अटका रहा और युद्धविराम 20 दिनों के भीतर ही टूट गया। इस बार ट्रंप की 13 दिनों की बमबारी के बावजूद ईरान ने होर्मुज नहीं खोला। उलटे यमन के हाउती विद्रोहियों से लाल सागर के रास्ते जाने वाले सऊदी तेल टैंकरों पर भी हमले कराने शुरू कर दिए। लिहाजा पश्चिमी एशिया से गुजरने वाले दोनों समुद्री व्यापार मार्ग बंद हो गए हैं। इन्हें खोलने के लिए एक बार फिर युद्धविराम की बातें हो रही हैं, जिन्हें लेकर ट्रंप आश्वस्त लगते हैं।
इस बार ईरान और अमेरिका के बीच सीधी बातचीत नहीं हो रही है। ईरान और ओमान आपस में तय कर रहे हैं कि व्यापारिक यातायात खुला रखने के लिए होर्मुज का प्रबंधन कैसे हो? दोनों के बीच यातायात के एक नए मार्ग पर सहमति भी बनी है, जिसके प्रवेश पर ईरान का नियंत्रण रहेगा और निकास पर ओमान का। इसका प्रविधान पिछली सहमति के पांचवें बिंदु में भी था, परंतु ट्रंप को ईरान के नियंत्रण वाली बात नहीं भाई और सहमति टूट गई थी। इस बार ईरान ने अपना रवैया और कड़ा करते हुए कहा है कि यातायात के प्रबंधन पर ओमान के साथ सहमति बन जाने के बावजूद होर्मुज तब तक नहीं खुलेगा जब तक अमेरिका के बर्ताव में सुधार नहीं आता। अमेरिका को अपनी नाकेबंदी खोलकर होर्मुज से अपनी नौसेना हटानी होगी, लड़ाई बंद करके बातचीत की मेज पर आना होगा और युद्धविराम तोड़कर किए हमलों से हुए नुकसान की भरपाई करनी होगी।
राष्ट्रपति ट्रंप 2015 की परमाणु संधि तोड़ चुके हैं और तीन बार समझौता वार्ताओं के बीच हमले कर चुके हैं। ऊपर से वे इजरायल के साथ संबंध बनाने की शर्त पर सऊदी अरब को परमाणु रिएक्टर देने की बात कर रहे हैं। दूसरी तरफ सऊदी ने दो दिन पहले पाकिस्तान और तुर्किए के साथ एक त्रिपक्षीय सामरिक समझौता किया है, जिसमें सहमति बनी कि एक पर हुए हमले को तीनों पर हुआ हमला माना जाएगा। ये तीनों ही देश अमेरिकी कृपापात्र हैं। इसलिए इस समय ऐसा समझौता होना अमेरिका की शह के बिना संभव नहीं है। इसलिए ईरान अब होर्मुज का नियंत्रण किसी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं है। रणनीतिकारों का मानना है कि होर्मुज का नियंत्रण ईरान को वह कुंजी देता है, जिसके सहारे वह खाड़ी के देशों और तेल पर निर्भर देशों को अनुकूल रिश्ते बनाए रखने पर विवश कर सकता है।
यह अर्थव्यवस्था की उस वीटो शक्ति की तरह है, जो उसकी ढाल बन सकती है, लेकिन ईरान की यह वीटो शक्ति भारत समेत पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा के लिए स्थायी खतरे की बात होगी।
असल में खाड़ी की ऊर्जा पर निर्भरता हमेशा से विश्व अर्थव्यवस्था की कमजोर नस रही है। पश्चिम एशिया में जब-जब लड़ाई छिड़ी तब-तब विश्व में ऊर्जा संकट आए, जिनसे महंगाई और मंदी जैसी मुश्किलें बढ़ीं। 1973 के अरब-इजरायल युद्ध में तेल के दाम चौगुने हो गए थे। इससे महंगाई बढ़ी, मंदी आई और शेयर बाजार धड़ाम हो गए थे। 1979 में ईरान की इस्लामी क्रांति के कारण तेल के दाम दोगुने हो गए थे। 1990 में इराक के कुवैत पर कब्जा कर लेने के कारण तेल के दाम तिगुने हो गए थे। अमेरिका और रूस के तेल निर्यातक बन जाने के कारण इस बार की लड़ाई से उतना गंभीर संकट तो पैदा नहीं हुआ, लेकिन कोविड की मार से उबरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए इतनी मार भी कम नहीं है। ऊपर से होर्मुज का नियंत्रण अब ईरान के हाथों में जाता दिखाई दे रहा है, जो शीर्ष नेतृत्व के मारे जाने और व्यापक विनाश होने के कारण उथल-पुथल के दौर में है।
दूसरी ओर, अमेरिका अपनी पूरी ताकत लगा कर भी ईरान को परास्त और खाड़ी के मित्र देशों को बचा नहीं पाया है। उसका वर्चस्व क्षीण होने से होर्मुज के ऊर्जा आपूर्ति मार्ग पर निर्भर रहना संभव नहीं रहा है। इसलिए हर देश विकल्प तलाश रहा है। भारत रूस, अमेरिका और वेनेजुएला के अलावा यूएई के फुजेरा बंदरगाह और ओमान के रास्ते तेल और गैस लेने की व्यवस्था कर रहा है। उसने ओमान के साथ सीमा व्यापार संधि की है और ओमान से गुजरात तक पाइपलाइन बिछाने पर विचार कर रहा है। इन उपायों के साथ-साथ भारत अपने नए तेल और गैस के भंडारों की खोज में भी जुटा है।
इस सबके बीच ऊर्जा विशेषज्ञों का कहना है कि दूसरे देशों और वैकल्पिक मार्गों से जीवाश्म ऊर्जा लेना और अपने यहां नए स्रोतों की तलाश करना समाधान नहीं है।
असली और स्थायी समाधान ऊर्जा की आत्मनिर्भरता हासिल करने में है, जो स्वच्छ ऊर्जा से ही हासिल हो सकती है। मसलन चीन की ऊर्जा खपत भारत से पांच गुना है, लेकिन उसका एक चौथाई से अधिक वह स्वच्छ संसाधनों से पैदा करता है। बिजली में तो वहां सौर, पवन और पनबिजली का प्रतिशत 42 से ऊपर जा चुका है। इसलिए खाड़ी से पैदा होने वाले ऊर्जा संकट का उस पर बहुत गंभीर असर नहीं हुआ। स्वच्छ ऊर्जा के पांच बड़े लाभ हैं। पहला-आप खाड़ी या रूस जैसे बड़े तेल उत्पादक देशों की उथल-पुथल से पैदा होने वाले ऊर्जा संकट से बचे रहते हैं। दूसरा-होर्मुज जैसे आपूर्ति मार्गों में गतिरोध से उत्पन्न संकट से बचते हैं। तीसरा-ऊर्जा आयात में खर्च होने वाले 12-13 लाख करोड़ रुपये बचा कर उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचा सुधारने में लगा सकते हैं। चौथा-विश्व का सबसे गंभीर संकट बने जलवायु परिवर्तन की रोकथाम में मदद करते हैं। पांचवां-ऊर्जा में आत्मनिर्भर बनते हैं और तेल प्रतिबंधों की पकड़ से बाहर होकर राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूत करते हैं। इसलिए अब घर-घर में इस जागरूकता का प्रसार आवश्यक हो गया है कि ऊर्जा आत्मनिर्भरता ही वास्तविक निजी एवं राष्ट्रीय सुरक्षा है।
(लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं)









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