विचार: दोयम दर्जे के निर्माण का सिलसिला
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के तुरंत बाद धंसने से देश में बुनियादी ढांचे के निर्माण की खराब गुणवत्ता उजागर हुई है
HighLights
लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे उद्घाटन के बाद ही कई जगह धंस गया।
सरकारी एजेंसियों में जवाबदेही की कमी और भ्रष्टाचार मुख्य कारण।
टेंडर प्रक्रिया में सुधार और गुणवत्तापूर्ण निर्माण आवश्यक है।
संजय गुप्त। लगभग एक माह पहले जब लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का लोकार्पण हुआ था तो उसे आधुनिक एक्सप्रेसवे की संज्ञा दी गई थी, लेकिन बरसात शुरू होते ही यह जगह-जगह धंसने लगा। इस एक्सप्रेसवे का इंतजार कानपुर और लखनऊ के साथ अन्य शहरों के लोग पिछले 15 वर्षों से कर रहे थे। जब यह एक्सप्रेसवे बार-बार धंसना शुरू हुआ तो उसका निर्माण करने वाली कंपनी पीएनसी इन्फ्रा के कुछ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई और पैच वर्क करके आवागमन बहाल करने के कदम उठाए गए।
कहना कठिन है कि यह एक्सप्रेसवे कब तक ठीक हो सकेगा, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि इसमें निर्माण की कमियां सामने आने से राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण की किरकिरी हो रही है। यह कोई पहला ऐसा एक्सप्रेसवे नहीं, जिसमें किसी तरह की खामी सामने आई हो। यह एक्सप्रेसवे जिस तरह बार-बार अनेक स्थानों पर धंसा, उससे यही स्पष्ट होता है कि जिन एजेंसियों के हाथों में इन्फ्रास्ट्रक्चर बनवाने की जिम्मेदारी है, उनका कामकाज ठीक नहीं है।
हमारे देश में अधिकांश परियोजनाएं सरकारी पैसों अर्थात जनता के धन से बनती हैं। इस तरह की परियोजनाएं एनएचएआइ, सीपीडब्ल्यूडी, एनबीसीसी या राइट्स जैसे भारत सरकार के उपक्रमों के जरिये पूरी की जाती हैं। क्या ये उपक्रम निर्माण के विश्वस्तरीय गुणवत्ता के मानकों से परिचित नहीं या फिर उन्होंने दोयम दर्जे के मानकों को ही विश्वस्तरीय समझ रखा है?
अपने देश में बहुत कम परियोजनाएं समय पर पूरी होती हैं और गुणवत्ता के मानकों पर खरी उतरती हैं। सरकारी एजेंसियां सीधे तौर पर निर्माण कार्य नहीं करतीं, बल्कि निजी क्षेत्र की कंपनियों के जरिये काम कराती हैं और उनके काम की निगरानी करती हैं। अब इसमें संदेह नहीं कि सरकारी एजेंसियां निजी कंपनियों के कार्यों की सही तरह निगरानी नहीं कर पा रही हैं। यही बात बुनियादी ढांचे का निर्माण करने वाली राज्य सरकार की एजेंसियों पर भी लागू होती है। इसका कारण जवाबदेही का अभाव और भ्रष्टाचार है।
जब किसी परियोजना में खामी-खराबी का मामला सामने आता है तो सरकारी एजेंसियां संबंधित कंपनी पर जुर्माना लगाती हैं और उन्हें काली सूची में भी डालती हैं, लेकिन स्थिति जस की तस है। दोयम दर्जे के निर्माण का सिलसिला कायम है। इसके चलते जनता के धन की बर्बादी ही हो रही है। हैरानी यह है कि आधारभूत ढांचे का निर्माण करने वाली जिन कंपनियों को काली सूची में डाला जाता है, वे कई बार नाम बदलकर फिर सरकारी एजेंसियों का काम करने लगती हैं। सरकारें इससे परिचित हैं कि सरकारी एजेंसियों और निजी कंपनियों के बीच जो साठगांठ है, वही दोयम दर्जे के बुनियादी ढांचे के निर्माण का कारण बन रही है, लेकिन यह साठगांठ टूट नहीं पा रही है।
जब किसी निर्माण कार्य के लिए टेंडर निकाला जाता है तो निजी कंपनियों को अनेक शर्तों से बांधा जाता है, लेकिन यह देखने में आ रहा है कि कई कंपनियां इन शर्तों पर खरी न उतर पाने के बावजूद बड़े-बड़े ठेके पा जाती हैं। हमारे नीति- नियंता इससे परिचित हैं कि टेंडर प्रक्रिया में खामियां हैं, लेकिन वे उसे दूर कर पाने में नाकाम हैं। समय आ गया है कि टेंडरिंग प्रक्रिया में तकनीकी बोली और लोएस्ट बिडिंग के नियमों में बदलाव किया जाए। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी दोयम दर्जे का निर्माण करने वाली कंपनियों को दंडित करने के आश्वासन कई बार दे चुके हैं, लेकिन स्थिति बदल नहीं पा रही है।
लगातार यह सामने आ रहा है कि सड़कों का निर्माण सही डिजाइन और इंजीनियरिंग के तहत नहीं हो पा रहा है। इसका परिणाम यह है कि एक्सप्रेसवे और हाईवे में ऐसे ब्लैक स्पाट बन जा रहे हैं, जो दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। जब प्रसिद्ध उद्योगपति सायरस मिस्त्री की एक मार्ग दुर्घटना में मृत्यु हुई थी तो राजमार्ग मंत्रालय ने कहा था कि इस पर विशेष ध्यान दिया जाएगा कि राजमार्गों के निर्माण में ब्लैक स्पाट न निर्मित होने पाएं, लेकिन अभी भी सड़कों के साथ-साथ पुलों और अन्य आधारभूत ढांचे के निर्माण में इंजीनियरिंग की बुनियादी खामियां देखने को मिलती हैं।
अपने देश में चार-पांच सौ वर्ष पुराने कई किले और हवेलियां अभी भी सही-सलामत हैं। अंग्रेजों के बनाए अनेक पुल और भवन भी कायम हैं, लेकिन आजादी के बाद निर्मित बुनियादी ढांचा टिकाऊ नहीं साबित हो पा रहा है। क्या आजादी के बाद हम मजबूत बुनियादी ढांचे का निर्माण करना भूल गए? बात केवल सड़कों और पुलों की ही नहीं, अन्य बुनियादी ढांचे में व्याप्त खामियों की भी है। इनमें नई बनी कालोनियां भी हैं। यह ठीक है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली सरकार बुनियादी ढांचे के निर्माण पर विशेष ध्यान दे रही है और पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश भर में एक व्यापक बुनियादी ढांचे का निर्माण भी हुआ है, लेकिन यह कहना कठिन है कि यह निर्माण गुणवत्ता के मानकों पर खरा साबित हुआ है।
ऐसा इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि बुनियादी ढांचे का निर्माण करने वाली सरकारी एजेंसियों की कार्यप्रणाली में जवाबदेही का अभाव है। बहुत कम निजी कंपनियां ऐसी हैं, जिनकी ओर से कराए गए निर्माण कार्य गुणवत्ता की कसौटी पर खरे साबित हो पा रहे हैं। ऐसा नहीं है कि भारत में गुणवत्तापूर्ण निर्माण का कौशल और तकनीक नहीं है, लेकिन एक के बाद एक सरकारों ने ठोस एवं टिकाऊ निर्माण को सुनिश्चित करने को कभी भी सर्वोच्च प्राथमिकता नहीं दी। मोदी सरकार भी तमाम प्रयत्नों के बावजूद गुणवत्तापूर्ण निर्माण सुनिश्चित नहीं कर पा रही है।
प्रधानमंत्री मोदी हर क्षेत्र में गुणवत्ता पर विशेष ध्यान देने की बात करते चले आ रहे हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि सरकारी एजेंसियां ही उनकी बातों पर गौर नहीं कर रही हैं। अब समय आ गया है कि सरकारी एजेंसियों को सख्त जवाबदेही के दायरे में लाया जाए, अन्यथा अरबों रुपये का जो बुनियादी ढांचा निर्मित हो रहा है और जिसकी देश को जरूरत भी है, वह सरकारी एजेंसियों और भ्रष्ट ठेकेदारों की मिलीभगत के कारण वैसे ही समस्याएं खड़ी करेगा, जैसी लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे ने की।









-1786040204043_v.webp)
-1786040396168_v.webp)
