विचार: नए रूप में सामने आता गांधीवाद
नई पीढ़ी के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। यदि नई पीढ़ी स्वयं लोकतांत्रिक मूल्यों का उदाहरण बनेगी तो बदलाव भी आएगा और लोकतंत्र भी मजबूत होगा और शायद यही 21वीं सदी का सबसे सच्चा गांधीवाद है।
HighLights
गांधीवाद अब खादी नहीं, संवाद और नैतिक साहस है।
युवा पीढ़ी लोकतांत्रिक मूल्यों से व्यवस्था को मजबूत कर रही है।
सत्याग्रह की आत्मा शांत नागरिक के अडिग अधिकारों में है।
राजीव शुक्ला। वर्ष 1930 में जब महात्मा गांधी ने नमक सत्याग्रह की घोषणा की, तो बहुत लोगों ने पूछा कि आखिर नमक ही क्यों? अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई के लिए क्या और कोई बड़ा मुद्दा नहीं? लेकिन गांधी जानते थे कि किसी भी जनांदोलन की शुरुआत नारों या भीड़ से नहीं होती, बल्कि एक ऐसे सवाल से होती है, जिसमें आम आदमी अपने जीवन के सामने खड़ी समस्या को देख सके। नमक हर घर की जरूरत में शामिल था, चाहे कोई अमीर हो या गरीब और इसलिए नमक कानून केवल एक कानून नहीं था। वह अन्याय का प्रतीक बन गया।
गांधी साबरमती आश्रम से निकले तो उनके साथ गिने-चुने लोग थे, लेकिन जैसे-जैसे वे दांडी की ओर बढ़ते गए, लोग रास्ते में जुड़ते गए। कोई भाषण सुनकर आया, कोई जिज्ञासा में आया। कोई इसलिए आया कि यह लड़ाई उसकी भी है। दांडी पहुंचते-पहुंचते वह गांधी का मार्च नहीं रहा, पूरे भारत का मार्च बन गया। गांधी की यही सबसे बड़ी राजनीतिक शक्ति थी। वे पहले लोगों के मन में सवाल पैदा करते थे, फिर उस सवाल को समाज का प्रश्न बनाकर उसे व्यापकता का स्वरूप देते थे।
लगभग एक सदी बाद भारत की नई पीढ़ी को देखकर वही बात फिर याद आती है। हाल के दिनों में युवाओं के आंदोलन ने एक बार फिर यह साबित किया कि भारत का युवा केवल इंटरनेट मीडिया पर अपनी बात रखने वाली पीढ़ी नहीं है। जब उसे लगता है कि किसी मुद्दे पर अपनी बात सार्वजनिक रूप से रखनी चाहिए, तब वह लोकतंत्र के दायरे में रहकर अपनी आवाज भी उठा सकता है। कुछ वर्षों से यह धारणा लगातार बनाई जाती रही कि आज का युवा केवल मोबाइल, रील और मनोरंजन तक सीमित है, लेकिन यह अधूरी तस्वीर पेश की जा रही थी, क्योंकि यही युवा जब किसी मुद्दे को लेकर शांतिपूर्ण ढंग से इकट्ठा होता है, अपनी बात रखता है और लोकतांत्रिक तरीकों से संवाद करता है, तो वह उस धारणा को चुनौती देता है। वह बताता है कि तकनीक ने उसकी भाषा बदली है, संवेदनशीलता नहीं।
यहीं से एक नए गांधीवाद की शुरुआत दिखाई देती है। यह गांधीवाद खादी पहनने या चरखा चलाने का आग्रह नहीं करता। यह किसी व्यक्ति की पूजा भी नहीं करता, बल्कि यह गांधीवाद उस मूल भावना को अपनाता है, जिसमें संवाद और नैतिक साहस सबसे बड़ी ताकत होते हैं। आज के युवाओं के हाथ में चरखे की जगह मोबाइल है। गांव-गांव पैदल यात्रा की जगह इंटरनेट है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि गांधी अप्रासंगिक हो गए हैं। यदि युवा अपनी बात बिना हिंसा के रखता है। यदि वह असहमति को लोकतांत्रिक अधिकार मानता है। यदि वह व्यवस्था से जवाब मांगता है, लेकिन व्यवस्था तोड़ने की बात नहीं करता, तो वह जाने-अनजाने गांधी की परंपरा को ही आगे बढ़ा रहा है।
गांधी का सबसे बड़ा योगदान केवल देश को आजादी दिलाना नहीं था। उन्होंने विरोध की भाषा बदल दी। उन्होंने बताया कि सबसे शक्तिशाली हथियार बंदूक नहीं, बल्कि नैतिक बल होता है। सत्ता को सबसे अधिक डर उस नागरिक से लगता है, जो शांत रहता है, पर अपने अधिकारों पर अडिग रहता है और यही सत्याग्रह का आत्मा होता है। आज भारत का लोकतंत्र भी उसी नैतिक शक्ति की जरूरत महसूस करता है। लोकतंत्र केवल मतदान से मजबूत नहीं होता। वह तब मजबूत होता है, जब नागरिक सवाल पूछते हैं, सरकार जवाब देती है। विपक्ष अपनी बात रखता है और समाज संवाद के लिए तैयार रहता है। यदि इनमें से कोई एक कड़ी कमजोर पड़ती है, तो लोकतंत्र का संतुलन भी कमजोर होने लगता है।
नई पीढ़ी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह हर बात को आंख मूंदकर स्वीकार नहीं करती। वह सवाल पूछती है। कई बार उसके सवाल असहज भी लगते हैं, लेकिन सवाल पूछने वाला समाज ही जीवित समाज होता है। गांधी भी यही चाहते थे। वे अंधभक्ति नहीं, जागरूक नागरिक चाहते थे और एक ऐसे भारत का सपना देखते थे, जहां सरकार जनता से डरे नहीं, बल्कि जनता के प्रति जवाबदेह रहे। यह भी सच है कि हर आंदोलन गांधीवादी नहीं होता और हर विरोध को गांधी का नाम नहीं दिया जा सकता। गांधीवाद का अर्थ केवल धरना देना नहीं है। उसका अर्थ है, सत्य के प्रति ईमानदारी, विरोधी के प्रति भी सम्मान, सार्वजनिक जीवन में मर्यादा और किसी भी कीमत पर हिंसा से दूरी। यदि ये तत्व मौजूद हैं, तभी किसी आंदोलन में गांधी का आत्मा दिखाई देता है। आज जरूरत इसकी नहीं है कि युवा गांधी जैसी वेशभूषा अपनाएं, बल्कि इसकी है कि वे गांधी के तरीके को समझें। असहमति को नफरत में बदलने के बजाय संवाद में बदलना, विरोध को हिंसा में बदलने के बजाय नैतिक आग्रह में बदलना और राजनीति को केवल सत्ता का खेल मानने के बजाय समाज परिवर्तन का माध्यम बनाना ही गांधी का रास्ता था।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और आज इस लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है। यदि यह युवा केवल चुनाव के दिन मतदान करने वाला नागरिक बनकर रह गया, तो लोकतंत्र अधूरा रहेगा। यदि यही युवा संविधान, अधिकार, कर्तव्य और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति जागरूक रहेगा, तो भारत का लोकतंत्र और अधिक मजबूत होगा। दांडी यात्रा हमें यह नहीं सिखाती कि हर आंदोलन नमक से शुरू होगा। वह हमें यह सिखाती है कि हर बड़ा परिवर्तन एक ऐसे छोटे से सवाल से शुरू होता है, जिसे लोग पहले मामूली समझते हैं। वही सवाल धीरे-धीरे समाज की चेतना बन जाता है।
शायद आज की नई पीढ़ी इसी रास्ते पर अपने ढंग से चल रही है। युवा पीढ़ी गांधी को किताबों में कम पढ़ती है, लेकिन कई बार उसके विचारों को अपने व्यवहार में जीती हुई दिखाई देती है। यदि नई पीढ़ी सत्य को महत्व दे, अहिंसा को कमजोरी नहीं, बल्कि शक्ति माने, संवाद को संघर्ष से ऊपर रखे और लोकतंत्र में विश्वास बनाए रखे, तो यह केवल उसका गांधीवाद ही नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक भविष्य की सबसे बड़ी पूंजी भी होगी। गांधी ने कहा था, 'आप वह परिवर्तन बनिए, जो दुनिया में देखना चाहते हैं।' नई पीढ़ी के सामने यही सबसे बड़ी चुनौती है। यदि नई पीढ़ी स्वयं लोकतांत्रिक मूल्यों का उदाहरण बनेगी तो बदलाव भी आएगा और लोकतंत्र भी मजबूत होगा और शायद यही 21वीं सदी का सबसे सच्चा गांधीवाद है।
(लेखक कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य हैं)











