डॉ. जयंतीलाल भंडारी। पिछले दिनों वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने लोकसभा में कराधान एवं अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 पेश किया। इसका मुख्य उद्देश्य भारत को वैश्विक पूंजी और व्यापार के लिए अधिक आकर्षक एवं भरोसेमंद गंतव्य बनाने के साथ ही आफशोर इन्वेस्टमेंट फंड्स और फंड प्रबंधकों के लिए नियमों को सरल बनाना है। देखा जाए तो यह भारत में विदेशी निवेश को आकर्षित करने, कर व्यवस्था में स्पष्टता लाने और घरेलू विनिर्माण को सुदृढ़ बनाने के परिप्रेक्ष्य में एक अत्यंत अहम कदम है। विदेशी पूंजी के प्रवाह में वृद्धि से देश की आर्थिक स्थिरता मजबूत होगी और बाहरी आर्थिक झटकों को सहने की क्षमता बढ़ेगी।

भारत विदेशी पूंजी आकर्षित करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। हाल में लागू आरबीआइ की नई रियायती स्वैप सुविधा को वैश्विक स्तर पर व्यापक समर्थन मिला है। इसका मुख्य उद्देश्य देश के विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ाना और भुगतान संतुलन को मजबूत करना है। इस योजना के तहत बैंकों को जिन तीन प्रमुख माध्यमों से विदेशी मुद्रा जुटाने में मदद मिली है, उनमें प्रमुख रूप से विदेश से ली जाने वाली जमा योजनाएं, विदेशी मुद्रा ऋण और बाहरी वाणिज्यिक उधार शामिल हैं।

इस समय भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों की वापसी के भी स्पष्ट संकेत देखने को मिल रहे हैं। लंबे समय तक बिकवाली के बाद विदेशी निवेशक एक बार फिर भारत जैसे स्थिर और सुरक्षित बाजारों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके प्रमुख कारणों में रुपये की स्थिरता, कंपनियों की बेहतर आय, भू-राजनीतिक चिंताओं में कमी और दीर्घकालिक निवेश के बेहतरीन अवसर शामिल हैं। भारत का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़कर 682 अरब डालर से अधिक के उच्च स्तर पर पहुंच गया है। इससे विदेशी संस्थागत निवेशकों का विश्वास बढ़ा है, वैश्विक ऋण भुगतान एवं प्रबंधन आसान हुआ है और घरेलू बाजार में महंगाई को नियंत्रित रखना संभव हुआ है।

वर्ष 1991 के आर्थिक संकट के बाद आर्थिक सुधारों का नया दौर शुरू किया गया। तब से अब तक विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए निरंतर कई ठोस कदम उठाए गए हैं। बीमा, दूरसंचार और खुदरा जैसे प्रमुख क्षेत्रों में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) की सीमा बढ़ाकर 100 प्रतिशत तक कर दी गई है। रक्षा क्षेत्र में भी कुछ शर्तों और नियमों के साथ 100 प्रतिशत एफडीआइ की अनुमति दी गई है। अधिकांश क्षेत्रों में पूर्व-सरकारी अनुमति के बिना (स्वचालित मार्ग से) निवेश करने की छूट प्रदान की गई है। पुराने और कठोर 'फेरा' कानून को समाप्त कर लचीला 'फेमा' लागू किया गया है, जिससे विदेशी मुद्रा का प्रवाह और लेनदेन आसान हो गया है।

देश को वैश्विक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने और विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने के लिए 'मेक इन इंडिया' अभियान शुरू किया गया है। निवेशकों को कर में छूट, सरल नियम और आधुनिक बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराने के लिए विशेष आर्थिक क्षेत्रों (एसईजेड) का विकास किया गया है। प्रमुख विनिर्माण क्षेत्रों में उत्पादन बढ़ाने वाली कंपनियों को वित्तीय प्रोत्साहन देने के लिए 'उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन' (पीएलआइ) जैसी व्यवस्थाएं की गई हैं। व्यापार को गति देने के लिए चालू खाते पर रुपये को पूरी तरह से परिवर्तनीय बनाया गया है तथा भारतीय शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत और पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआइ) के लिए नियमों को सरल किया गया है।

विभिन्न बहुआयामी प्रयासों के बावजूद भारत में टिकाऊ विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए अभी भी कई ठोस सुधारों की आवश्यकता है। केवल बड़े घरेलू बाजार और उच्च विकास दर के भरोसे रहना पर्याप्त नहीं होगा। इसके लिए देश के नियामक ढांचे, कर प्रणाली और कानूनी तंत्र में व्यापक बदलाव अनिवार्य हैं। दीर्घकालिक निवेश के लिए स्थिर नीतियां पहली प्राथमिक शर्त हैं। कर नियमों, सीमा शुल्क और क्षेत्र-विशेष के प्रविधानों में अचानक होने वाले परिवर्तनों से निवेशक दूर भागते हैं। केंद्र और राज्य स्तर पर विभिन्न स्वीकृतियों, अनुमतियों और जटिल नियमों का बोझ अभी भी बहुत अधिक है। इसके अतिरिक्त, न्यायालयों में विवाद समाधान की धीमी गति और अनुबंधों को लागू करने में होने वाली देरी विदेशी पूंजी के प्रवाह में बड़ी बाधा बनती है।

निवेशकों का विश्वास बनाए रखने के लिए सरकार द्वारा राजकोषीय घाटे का नियंत्रण और मुद्रास्फीति को संतुलित सीमा में रखना जरूरी है। भारतीय मुद्रा के मूल्य में अत्यधिक उतार-चढ़ाव निवेशकों के रिटर्न को नुकसान पहुंचाता है, इसलिए विनिमय दर में स्थिरता बनाए रखना आवश्यक है। यद्यपि भारत का शेयर बाजार मजबूत है,पर कारपोरेट ऋण बाजार अभी भी सीमित है। इसे अधिक विस्तृत और तरल बनाना पोर्टफोलियो निवेशकों को आकर्षित करने के लिए अनिवार्य है। पूंजी की आवाजाही पर लगे प्रतिबंधों को कम करके इसे अधिक लचीला बनाना होगा। चीन पर अपनी निर्भरता कम करने (चाइना प्लस वन) की इच्छुक वैश्विक कंपनियों को आकर्षित करने के लिए केवल उत्पादन-आधारित प्रोत्साहन योजनाएं ही पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए आधुनिक बुनियादी ढांचे, परिवहन लागत में कमी और कुशल कार्यबल का एक एकीकृत ढांचा तैयार करना होगा।

(लेखक अर्थशास्त्री हैं)