मायका बन जाता है गेस्टहाउस! जहां बचपन बीता, शादी के बाद वही घर क्यों हो जाता है बेटियों के लिए पराया?
बेटियों को सिखाया जाता है कि शादी के बाद उनका ससुराल ही उनका घर है, लेकिन ऐसा क्या बदल जाता है कि माता-पिता का घर पराया हो जाता है? ...और पढ़ें

शादी के बाद क्यों अपना नहीं रहता माता-पिता का घर? (AI Generated Image)
HighLights
भारतीय समाज में बेटियों को पराया धन समझा जाता है
शादी के बाद बेटियों का माता-पिता के घर से नाता कमजोर होने लगता है
अपना ही बचपन का घर उन्हें पराया लगने लगता है
लाइफस्टाइल डेस्क, नई दिल्ली। बचपन से ही हमारे देश में बेटियों को पराया धन कहा जाता है। शादी होते ही लड़की का असली घर उसके पति का घर बन जाता है और माता-पिता का घर पराया हो जाता है। ऐसे में मन में सवाल आता है कि क्यों शादी के बाद अपने ही माता-पिता के घर आने के उसे इजाजत लेनी पड़ती है?
बचपन से जिस घर में पली-बढ़ी, वहीं घर शादी के बाद उसका अपना क्यों नहीं रहता? इस सवाल का जवाब इतना सीधा नहीं है। इसलिए हमने सीनियर साइकोलॉजिस्ट डॉ. मोनिका शर्मा से बात की, ताकि इसके पीछे के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझ सकें। आइए समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर शादी के बाद मायके से रिश्ते क्यों और कैसे कमजोर पड़ने लगते हैं।
परंपराएं और नई जिम्मेदारियों का बोझ
भारतीय समाज में शादी के बाद लड़की का अपने पति के घर जाकर बसना एक पुरानी परंपरा है। सदियों से बेटियों को इसलिए पराया धन माना जाता रहा है और यही वजह है कि शादी के बाद उनके माता-पिता का घर मायका बन जाता है, उनका अपना घर नहीं।
शादी के बाद लड़की की पहचान सिर्फ एक बहू और पत्नी के रूप में सिमट जाती है। उस पर ससुराल की नई जिम्मेदारियों का बोझ आ जाता है। नया घर संभालना, सास-ससुर की सेवा, पति की देखभाल, बच्चों की परवरिश और ससुराल वालों की उम्मीदों पर खरा उतरने के दबाव में उनकी सारी एनर्जी खत्म हो जाती है और अपने मायके के रिश्तों के लिए समय निकालना मुश्किल हो जाता है।
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पराएपन की मानसिकता
शादी के बाद लड़कियों का ससुराल अक्सर मायके से दूर होता है और कई बार दूसरे शहर या राज्य में रहने जाना पड़ता है। ऐसे में शादी की शुरुआत में तो मिलने-जुलने का उत्साह रहता है, लेकिन रोजमर्रा की भागदौड़ में प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। रोज-रोज या हर हफ्ते मायके जाना मुश्किल लगने लगता है और फोन पर बातचीत सिमट जाती है। धीरे-धीरे फोन पर भी बातचीत कम हो जाती है। साथ ही, ससुरालवालों की भी यह उम्मीद होती है कि नई बहू अपने मायके से ज्यादा जुड़ाव न रखें और अपना पूरा ध्यान ससुराल और वहां के लोगों पर दे।
इसमें माता-पिता की सोच भी बड़ी भूमिका निभाती है। पारंपरिक सोच के कारण माता-पिता भी मानते हैं कि बेटी की शादी के साथ उनकी जिम्मेदारी खत्म हुई। वे इस डर से भी बेटी को ज्यादा फोन नहीं करते या घर नहीं बुलाते कि कहीं इससे उसके ससुराल में कोई परेशानी न खड़ी हो जाए। यह आज के समय में भी ऐसा ही हो रहा है। पढ़ी-लिखी और नौकरीपेशा बेटियां मायके से जुड़ी तो रहती हैं, लेकिन सामाजिक दबाव, बच्चों की पढ़ाई और नौकरी के चलते यह रिश्ता सिर्फ आने-जाने तक ही सीमित रह जाता है।
इस सोच के नुकसान क्या हैं?
बेटियों को पराया समझने की मानसिकता पितृसत्ता और लैंगिक भेदभाव पर टिकी है। जहां बेटों को शादी के बाद भी घर का हिस्सा माना जाता है, वहीं बेटी को पूरी तरह किसी और की संपत्ति समझा जाता है। हैरान करने वाली बात यह है कि ससुराल में भी बहुओं को ताना दिया जाता है कि ये उनका अपना घर नहीं है। इस सोच से महिलाओं के आत्मसम्मान को ठेस पहुंचती है। बेटियां अपने ही माता-पिता के घर जाने से झिझकने लगती हैं और जरूरत पड़ने पर मदद मांगने में भी संकोच करती हैं।
यही वजह है कि कई महिलाएं ससुराल में अत्याचार सहती रहती हैं, लेकिन अपने मायके का दरवाजा खटखटाने से पहले सौ बार सोचती हैं। इतना ही नहीं, इस सोच की वजह से कन्या भ्रूण हत्या, शिक्षा में भेदभाव और महिलाओं की आजादी पर रोक जैसी सामाजिक बुराइयां पैदा होती हैं।