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    Chanakya Niti: जीवन में इन चीजों की समझ है जरूरी, वरना व्यर्थ है आपका जीवन 

    By Suman SainiEdited By: Suman Saini
    Updated: Tue, 17 Mar 2026 06:03 PM (IST)

    आचार्य चाणक्य ने अपने नीति शास्त्र में बताया है कि जीवन में किन चीजों की समझ होना बेहद जरूरी है, वरना आपके जीवन का कोई अर्थ नहीं रहता। ...और पढ़ें

    Chanakya Niti in hindi (AI Generated Image)

    Chanakya Niti in hindi (AI Generated Image)

    HighLights

    1. चाणक्य ने अपनी नीति में बताई हैं कई उपयोग बातें

    2. जीवन के चार पुरुषार्थों को समझना अनिवार्य है

    3. इनकी समझ के बिना व्यर्थ है व्यक्ति का जीवन

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। चाणक्य नीति (Chanakya Niti tips) आपके जीवन में सफलता, नैतिकता, और बुद्धिमत्ता के लिए मार्गदर्शक साबित हो सकती है। इनमें धन और समय के सदुपयोग के बारे में बताया गया है। अगर आप अपने जीवन में इन सीखों को उतारते हैं, तो आपके लिए तरक्की के रास्ते खुल सकते हैं। चलिए जानते हैं चाणक्य की कुछ महत्वपूर्ण सीख।

    श्लोक 1 - धर्मार्थकाममोक्षेषु यस्य नास्ति विनिर्णयः।
    जन्मजन्मनि मर्त्यस्य मरणं तस्य केवलम्।।

    अर्थ - चाणक्य नीति में वर्णित यह श्लोक यह बताता है कि मनुष्य को जीवन के चार पुरुषार्थों को समझना अनिवार्य है, वरना उसका जीवन व्यर्थ है। इस श्लोक के अनुसार, जिस व्यक्ति के जीवन में धर्म (यानी नैतिकता), अर्थ ( यानी धन), काम (अर्थात इच्छाओं) और मोक्ष (अर्थात मुक्ति) के बारे में कोई निर्णय या समझ नहीं है, उसका जन्म-मरण व्यर्थ है। ऐसे मनुष्य का जीवन केवल बार-बार जन्म लेने और मरने का चक्र मात्र है।

    चाणक्य के अनुसार, जिस व्यक्ति को इन चार चीजों की समझ नहीं है, उनका जीवन उद्देश्यहीन है। अर्थात जिस व्यक्ति के जीवन में उचित लक्ष्य या पुरुषार्थ नहीं हैं, वह मनुष्य होकर भी पशुतुल्य जीवन ही जी रहा है।

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    (AI Generated Image)

    मिलती है यह शिक्षा

    चाणक्य नीति के इस श्लोक से हमें शिक्षा मिलती है कि मनुष्य को अपने जीवन में नैतिक आचरण, आजीविका, मर्यादित इच्छाओं और अंतिम मोक्ष की प्राप्ति के लिए प्रयास करते रहना चाहिए, न कि केवल शारीरिक सुख की प्राप्ति में अपने समय नष्ट करना चाहिए।

    Chanakya f i

    (Picture Credit: Freepik)

    श्लोक 2 -"न स्नेहात् कृत्वा विघ्नं न द्वेषात् न च लोभतः।
    न मोहत् कार्यमत्यन्तं कार्यं कार्यवदाचरेत्"

    इस श्लोक में आचार्य चाणक्य कहते हैं कि किसी भी काम को स्नेह, द्वेष (नफरत), लोभ (लालच) और मोह में आकर नहीं करना चाहिए। बल्कि उस कार्य को अपना कर्तव्य समझकर, निष्पक्ष और विवेकपूर्ण तरीके से ठीक उसी प्रकार करें, जैसा उसे किया जाना चाहिए।

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    यह है मूल संदेश

    आचार्य चाणक्य इस श्लोक में कहना चाहते हैं कि किसी भी कार्य को उसकी आवश्यकता के अनुसार, निष्पक्षता के साथ करना ही सही तरीका है।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें। दैनिक जागरण तथा जागरण न्यू मीडिया अंधविश्वास के खिलाफ है।