कलम और दवात के देवता ने कैसे संभाला सृष्टि के कर्मों का लेखा-जोखा? यमराज से जुड़ा है कनेक्शन
हिंदू धर्म में भगवान चित्रगुप्त को हर मनुष्य के पाप और पुण्य का हिसाब रखने वाला देवता माना गया है। जानिए ब्रह्मा जी की 11,000 सालों की कठिन तपस्या से ...और पढ़ें

बुद्धि और लेखनी के देवता हैं भगवान चित्रगुप्त

समय कम है?
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धर्म डेस्क, नई दिल्ली। हिंदू धर्म में भगवान चित्रगुप्त को एक बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। उन्हें ब्रह्मांड का 'प्रथम मुनीम' या 'चीफ अकाउंटेंट' कहा जा सकता है। आइए जानते हैं उनकी उत्पत्ति और यमराज के साथ उनके गहरे संबंध की रोचक पौराणिक कथा।
ब्रह्मा जी की 'काया' से जन्म का रहस्य
पद्म पुराण के अनुसार, सृष्टि के निर्माण के समय जब ब्रह्मा जी ने जीव-जंतुओं और मनुष्यों को बनाया, तो उनके सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई। यमराज ने ब्रह्मा जी से शिकायत की कि संसार की आबादी इतनी बढ़ गई है कि अब हर व्यक्ति के पाप और पुण्य का सटीक हिसाब रखना उनके लिए अकेले मुमकिन नहीं है।
तब ब्रह्मा जी ने एक ऐसे सहायक की कल्पना की जो अत्यंत बुद्धिमान हो और जिसकी याददाश्त अचूक हो। इसके लिए ब्रह्मा जी ग्यारह हजार वर्षों तक कठिन तपस्या और ध्यान में लीन रहे। जब उन्होंने अपनी आंखें खोलीं, तो उनके सामने एक तेजस्वी पुरुष खड़ा था, जिसके एक हाथ में कलम और दूसरे हाथ में दवात थी। ब्रह्मा जी की 'काया' (शरीर) से हुई उत्पत्ति के कारण उन्हें 'कायस्थ' कहा गया और उनका नाम 'चित्रगुप्त' रखा गया।
यमराज और चित्रगुप्त का अटूट संबंध
ब्रह्मा जी ने चित्रगुप्त को यमराज के दरबार में सर्वोच्च स्थान दिया। उनका मुख्य कार्य हर प्राणी के कर्मों का रिकॉर्ड रखना तय हुआ।
अग्रसंधानी पुस्तक क्या है?
माना जाता है कि चित्रगुप्त जी के पास एक अदृश्य पुस्तक है जिसे 'अग्रसंधानी' कहा जाता है। इसमें हर व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक के हर विचार और कर्म का विवरण दर्ज होता है।
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न्याय का आधार: जब यमराज किसी आत्मा का न्याय करते हैं, तो वे चित्रगुप्त जी से उसके कर्मों की रिपोर्ट मांगते हैं। उसी रिपोर्ट के आधार पर तय होता है कि आत्मा को स्वर्ग मिलेगा या नर्क।
कलम और दवात का महत्व
भगवान चित्रगुप्त को ज्ञान, बुद्धि और लेखनी का देवता माना जाता है। वो इस बात के प्रतीक हैं कि हमारे द्वारा किया गया कोई भी कार्य, चाहे वह कितना भी गुप्त क्यों न हो, ईश्वर की नजरों से छिपा नहीं है। उनकी पूजा मुख्य रूप से 'यम द्वितीया' (भाई दूज) के दिन की जाती है, जिसे 'कलम-दवात पूजा' भी कहते हैं।
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