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    महादेव के परम भक्त नंदी ने क्यों दिया था रावण को ये श्राप? पढ़ें रामायण का अनसुना प्रसंग

    Updated: Wed, 10 Jun 2026 09:00 PM (IST)

    रावण ने कैलाश पर्वत पर नंदी के वानर स्वरूप का उपहास किया, जिससे क्रोधित नंदी ने उसे श्राप दिया कि वानर ही उसके कुल का नाश करेंगे। यह श्राप तब सत्य हुआ ...और पढ़ें

    नंदी ने रावण को क्यों दिया था श्राप? (AI-Generated Image)

    नंदी ने रावण को क्यों दिया था श्राप? (AI-Generated Image)

    HighLights

    1. रावण ने नंदी के वानर स्वरूप का उपहास किया था

    2. क्रोधित नंदी ने रावण को वानरों से विनाश का श्राप दिया

    3. हनुमान और वानर सेना ने रावण के कुल का अंत किया

    धर्म डेस्क, नई दिल्ली। सनातन धर्म में वाल्मीकि रामायण को बेहद महत्वपूर्ण माना गया है। इस ग्रंथ में कई प्रसंग देखने को मिलते है, जिसमें भगवान शिव के प्रमुख गण नंदी के द्वारा रावण को दिया श्राप का प्रसंग भी शामिल है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर क्यों नंदी ने लंकापति रावण को श्राप दिया था। अगर नहीं पता, तो ऐसे में आइए इस आर्टिकल में आपको विस्तार से बताते हैं वाल्मीकि रामायण के उत्तर कांड के इस महत्वपूर्ण प्रसंग के बारे में।

    रावण को क्यों मिला था नंदी का श्राप?

    पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार लंकापति रावण भगवान शिव जी मिलने कैलाश पर्वत पर गया था। वहां पर उसने नंदी को देखा और अहंकार से हंसते हुए कहा कि तुम्हारा स्वरूप कैसा विचित्र है। रावण ने आगे कहा कि नंदी तुम तो वानर की तरह लग रहे हो। रावण के इस दुर्व्यवहार से नंदी को क्रोध आया और रावण को श्राप दिया कि जिस वानर पर तू आज हंस रहा है।

    एक दिन यही वानर तेरे और तेरे कुल के सर्वनाश करेंगे। सीता हरण के बाद महादेव के गण नंदी का यह श्राप सत्य सिद्ध हुआ। इस बात को तो सभी लोग जानते हैं कि त्रेतायुग में माता सीता के हरण के बाद भगवान श्रीराम, हनुमान जी और विशाल वानर सेना ने ही लंकापति रावण का अंत किया।

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    रामायण में मिलता है वर्णन

    नंदी के द्वारा रावण को दिए इस श्राप का वर्णन वाल्मीकि रामायण उत्तर कांड के 16वें सर्ग में मिलता है।

    कौन थे नंदी?

    पौराणिक कथाओं के अनुसार, नंदी महादेव के परम भक्त और कैलाश पर्वत के मुख्य द्वारपाल हैं। नंदी को भगवान शिव का वाहन भी माना जाता है। नंदी कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और मां पार्वती के निवास स्थान के रक्षक और मुख्य द्वारपाल की भूमिका निभाते हैं। शिव पुराण में बताया गया है कि नंदी महर्षि शिलाद के पुत्र हैं। महर्षि शिलाद ने पुत्र की प्राप्ति के लिए घोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या को देख महादेव प्रसन्न हुए और उन्हें पुत्र की प्राप्ति का वरदान दिया।

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    भूमि जोतते समय महर्षि शिलाद को एक बालक मिला, जिसका नाम उन्होंने नंदी रखा। मंदिर में नंदी का मुख शिवलिंग की तरफ होता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहने से वह संदेश सीधे भगवान शिव तक पहुंच जाता है। नंदी की पूजा न करने से महादेव की साधना अधूरी मानी जाती है। इसलिए कहा जाता है कि शिव पूजन के साथ नंदी की पूजा जरूर करनी चाहिए।

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    अस्वीकरण: इस लेख में बताए गए उपाय/लाभ/सलाह और कथन केवल सामान्य सूचना के लिए हैं। दैनिक जागरण यहां इस लेख फीचर में लिखी गई बातों का समर्थन नहीं करता है। इस लेख में निहित जानकारी विभिन्न माध्यमों/ज्योतिषियों/पंचांग/प्रवचनों/मान्यताओं/धर्मग्रंथों/दंतकथाओं से संग्रहित की गई हैं। पाठकों से अनुरोध है कि लेख को अंतिम सत्य अथवा दावा न मानें एवं अपने विवेक का उपयोग करें।