विचार: संवेदना के साथ न्याय भी सुनिश्चित हो
दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई हो और आरोप असत्य या दुर्भावनापूर्ण सिद्ध होने पर निर्दोष व्यक्ति का सम्मान लौटाया जाए।
HighLights
साहिल वाकोडे की आत्महत्या पर निष्पक्ष जांच और संयम आवश्यक
आईआईटी में जातिगत भेदभाव और शैक्षणिक दबावों का सामना
संस्थागत सुधार, परामर्श और भावनात्मक समर्थन की तत्काल जरूरत
डॉ. मनिष दाभाडे। आईआईटी बांबे के छात्र साहिल वाकोडे की आत्महत्या एक गहरी मानवीय त्रासदी है। एक परिवार ने अपना बेटा खोया है, सहपाठी सदमे और आक्रोश में हैं, परिसर के भीतर भरोसा टूटा है और एक शिक्षक आरोपों के घेरे में है। ऐसे क्षण में संवेदना, संयम और निष्पक्षता तीनों की आवश्यकता है। किसी की पीड़ा को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन पीड़ा को प्रमाण भी नहीं बनाया जा सकता। संस्थान की प्रतिष्ठा आरोपों पर पर्दा डालने का बहाना नहीं हो सकती और केवल आरोप लग जाने से किसी को दोषी भी नहीं ठहराया जा सकता। इस मामले की निष्पक्ष जांच ही सत्य तक पहुंचने का एकमात्र रास्ता है। किसी छात्र की आत्महत्या को राजनीति का रंगमंच नहीं बनने देना चाहिए।
टीवी की उत्तेजक बहसें, डिजिटल मीडिया पर तत्काल फैसले और दोष सिद्ध होने से पहले गिरफ्तारी अथवा दोषमुक्ति की मांग-ये सब सत्य की खोज को कठिन बनाते हैं। आत्महत्या समाज और संस्थान के लिए आत्ममंथन का क्षण है। आईआईटी केवल शिक्षण संस्थान नहीं, स्वतंत्र भारत की सबसे सफल वैश्विक पहचान में से एक हैं। क्यूएस विश्व विश्वविद्यालय रैंकिंग 2026 में आईआईटी बांबे दुनिया में 129वें और भारत में दूसरे स्थान पर रहा। दशकों की मेहनत से अर्जित इस प्रतिष्ठा की रक्षा होनी चाहिए, लेकिन प्रतिष्ठा की रक्षा सवालों को दबाने से नहीं, बल्कि कठिन सवालों का ईमानदारी से सामना करने से होती है।
साहिल की मृत्यु से पहले की घटनाओं को लेकर दो अलग पक्ष सामने आए हैं। एक ओर परीक्षा के दौरान फोन के इस्तेमाल की बात है और परिवार के जातिगत भेदभाव के आरोप हैं और दूसरी ओर आईआईटी बांबे का कहना है कि छात्र ने प्रशासन को कोई शिकायत नहीं दी थी। शिक्षक समुदाय का तर्क है कि परीक्षा निरीक्षक ने केवल संस्थान की निर्धारित प्रक्रिया का पालन किया। पुलिस ने आत्महत्या के लिए उकसाने और एससी-एसटी अत्याचार निवारण कानून के तहत मामला दर्ज किया है, पर अभी कोई आरोप सिद्ध नहीं हुआ है। इसलिए किसी एक सुविधाजनक कहानी को अंतिम सत्य मान लेना गलत होगा। जातिगत भेदभाव भारत की सामाजिक वास्तविकता है और यह मान लेना भोलापन होगा कि प्रतिष्ठित संस्थानों के द्वार पर पहुंचते ही जाति का प्रभाव समाप्त हो जाता है। भेदभाव हमेशा खुले लिखित आदेश के रूप में सामने नहीं आता। वह उपहास और कमतर समझे जाने के रूप में भी दिखाई दे सकता है।
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा गठित राष्ट्रीय कार्यबल ने उच्च शिक्षण संस्थानों में आरक्षण विरोधी सोच, जातिगत मजाक, सूक्ष्म आक्रामक व्यवहार और असमान शैक्षणिक सहयोग जैसी समस्याओं की ओर ध्यान दिलाया है। वास्तविक शिकायतों को राजनीति बताकर खारिज करना पीड़ित छात्रों का भरोसा तोड़ेगा और उन्हें शिकायत करने से रोकेगा, लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। कोई छात्र सामाजिक रूप से वंचित वर्ग से आता है, इसलिए परीक्षा अनुशासन से मुक्त नहीं हो सकता। नकल के आरोप की जांच करना शिक्षक का कर्तव्य है। यदि जांच में पाया जाता है कि संबंधित शिक्षक ने नियमानुसार काम किया और जातिगत अपमान नहीं किया तो उनकी प्रतिष्ठा बहाल की जानी चाहिए।
शिक्षा का उद्देश्य केवल सफल विद्यार्थियों को आगे बढ़ाना नहीं, बल्कि गलती करने वाले छात्र को संभलना और फिर खड़ा होना भी सिखाना है। नियम कठोर हो सकते हैं, व्यवहार अपमानजनक नहीं। अनुशासन जरूरी है, पर उसके साथ सुनवाई, स्पष्ट प्रक्रिया, परामर्श और भावनात्मक सहारा भी जरूरी है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार 2020-21 से 2024-25 के बीच आईआईटी में 53 छात्रों की मौत हुई, जिनमें 45 आत्महत्याएं थीं। मृतकों में 29 छात्र एससी-एसटी अथवा ओबीसी समुदायों से थे। ये आंकड़े जातिगत कारण को न तो सिद्ध करते हैं, न खारिज। छात्रों की आत्महत्या प्रायः किसी एक घटना का परिणाम नहीं होती। शैक्षणिक दबाव, अकेलापन, मानसिक स्वास्थ्य, आर्थिक चिंता, पारिवारिक अपेक्षाएं, सामाजिक भेदभाव आदि कई कारण एक साथ काम कर सकते हैं। इसीलिए संस्थागत सुधार अब विकल्प नहीं, आवश्यकता हैं।
एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम पर भी संतुलित दृष्टि चाहिए। जातिगत अपमान और अत्याचार से सुरक्षा देने वाला यह कानून आवश्यक है। इसके कमजोर होने का सबसे बड़ा नुकसान उन लोगों को होगा, जिनके पास पहले ही शक्ति और संसाधन कम हैं। साथ ही, यदि निष्पक्ष जांच या न्यायिक प्रक्रिया से किसी शिकायत का दुर्भावनापूर्ण, झूठा अथवा निजी बदले के लिए किया गया इस्तेमाल सिद्ध होता है तो उसे भी नियंत्रित किया जाना चाहिए। कानून की रक्षा और उसके दुर्भावनापूर्ण इस्तेमाल पर रोक, ये विरोधी नहीं, पूरक लक्ष्य हैं। झूठा मुकदमा वास्तविक पीड़ितों की लड़ाई को भी कमजोर करता है।
आईआईटी बांबे की शुरुआती सार्वजनिक टिप्पणी और उसके बाद आई क्षमायाचना यह याद दिलाती है कि ऐसी त्रासदी के बाद संस्थानों को जल्दबाजी में कारण निर्धारित नहीं करना चाहिए। प्रशासन को सत्यापित तथ्यों तक सीमित रहना चाहिए, परिवार की निजता की रक्षा करनी चाहिए और जांच को प्रभावित करने वाले बयान नहीं देने चाहिए। यही संयम मीडिया, राजनीतिक दलों, छात्र समूहों और शिक्षक संगठनों को भी दिखाना होगा। मार्च और प्रतिमार्च से न्याय नहीं निकलता।
निष्पक्ष जांच, दस्तावेजी साक्ष्य और संस्थागत सुधार से निकलता है। देश को अपने आईआईटी से दो बातों की मांग एक साथ करनी चाहिए- विश्वस्तरीय उत्कृष्टता और मानवीय संवेदना। शैक्षणिक मानकों से कोई समझौता न हो, नकल को कोई संरक्षण न मिले और राजनीतिक दबाव में नियम न बदलें, लेकिन वास्तविक जातिगत भेदभाव को भी नकारा न जाए और हर शिकायत की सुनवाई स्वतंत्र, विश्वसनीय और समयबद्ध संस्थागत ढांचे में हो। दोष सिद्ध होने पर कार्रवाई हो और आरोप असत्य या दुर्भावनापूर्ण सिद्ध होने पर निर्दोष व्यक्ति का सम्मान लौटाया जाए। आईआईटी की प्रतिष्ठा तब और मजबूत होगी, जब परिसर का हर छात्र यह भरोसा कर सके कि यहां नियम सबके लिए समान हैं, भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं और जीवन किसी एक गलती से कहीं अधिक मूल्यवान है।
(लेखक जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर हैं)
-1790359141031_v.webp)

-1790358381726_v.webp)
-1790308245984_v.webp)







