जागरण संपादकीय: अनुत्तरित प्रश्न
चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा की रक्षा करना और उसे अपुष्ट-अनर्गल आरोपों से बचाना अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त की जिम्मेदारी नहीं। यह जिम्मेदारी दोनों चुनाव आयुक्तों की भी है।
HighLights
चुनाव आयुक्तों ने मुख्य चुनाव आयुक्त के फैसलों पर वोट क्यों नहीं किया?
शिकायती चिट्ठी कैबिनेट सचिव को क्यों, राष्ट्रपति को क्यों नहीं भेजी?
विपक्ष का धरना चुनाव प्रक्रिया को अविश्वसनीय बनाने का अभियान है।
एक ऐसे समय जब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार विपक्ष के निशाने पर हैं और वह उनसे इस्तीफा मांगने में लगा हुआ है, तब किसी को दोनों चुनाव आयुक्तों सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी से इस प्रश्न का उत्तर भी मांगना चाहिए कि आखिर उन्होंने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कथित मनमाने फैसलों के खिलाफ एकजुट होकर वोट क्यों नहीं किया? चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार फैसले या तो सहमति से होते हैं या फिर बहुमत से। यदि दोनों चुनाव आयुक्त चाह लें कि मुख्य चुनाव आयुक्त के किसी प्रस्ताव या सुझाव पर अमल नहीं होना चाहिए तो वे उसके खिलाफ वोट कर उसे निष्प्रभावी कर सकते हैं। आखिर उन्होंने ऐसा क्यों नहीं किया?
क्यों न यह मान लिया जाए कि जिन फैसलों पर पहले उन्होंने असहमति जताई, उन पर बाद में सहमत हो गए, जैसा कि चुनाव आयोग की ओर से जारी स्पष्टीकरण में कहा गया है? यदि ऐसा ही हुआ तो फिर हंगामा क्यों और यदि ऐसा नहीं हुआ तो दोनों चुनाव आयुक्त सामने आकर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं करते? दोनों चुनाव आयुक्तों को इस प्रश्न का भी उत्तर देना चाहिए कि आखिर उन्होंने अपनी शिकायती चिट्ठी कैबिनेट सचिव को क्यों भेजी? क्या उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि वे कैबिनेट सचिव के अधीन काम नहीं करते? जब कैबिनेट सचिव चुनाव आयोग के कामकाज में कोई हस्तक्षेप कर ही नहीं सकते तो फिर उन्हें चिट्ठी लिखने का क्या औचित्य?
यदि दोनों चुनाव आयुक्तों को इस आशय की चिट्ठी किसी को लिखनी ही थी कि उनकी जानकारी के बिना काम हो रहा है अथवा कथित तौर पर असंवैधानिक फैसले लिए जा रहे हैं तो वह राष्ट्रपति को लिखनी चाहिए थी। यही नियम कहता है और इसका एक उदाहरण भी मौजूद है। एक समय मुख्य चुनाव आयुक्त एन गोपालस्वामी ने चुनाव आयुक्त नवीन चावला के कामकाज से नाखुश होकर उनके खिलाफ राष्ट्रपति को चिट्ठी लिखी थी। स्पष्ट है कि दोनों चुनाव आयुक्तों की चुप्पी विपक्ष को बल प्रदान कर रही है।
चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा की रक्षा करना और उसे अपुष्ट-अनर्गल आरोपों से बचाना अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त की जिम्मेदारी नहीं। यह जिम्मेदारी दोनों चुनाव आयुक्तों की भी है। जहां तक विपक्ष की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ धरना-प्रदर्शन करने की बात है तो इससे कुछ हासिल होने वाला नहीं है। इस धरना-प्रदर्शन का उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया को अविश्वसनीय बताना है। विपक्ष यह माहौल बनाने की कोशिश में है कि उसे चुनावों में वांछित सफलता इसलिए नहीं मिल रही है, क्योंकि चुनाव निष्पक्ष तरीके से नहीं होते। यह और कुछ नहीं बिना किसी ठोस प्रमाण एक संवैधानिक संस्था को बदनाम करने का अभियान है। विपक्ष यह अभियान पहले भी चला चुका है और उसे नाकामी ही मिली है।
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