डॉ. दीपक कोहली। इक्कीसवीं सदी के वैश्वीकृत और प्रौद्योगिकी-संचालित संसार में जिस वस्तु को आधुनिक सभ्यता का अदृश्य हृदय कहा जा सकता है, वह अति-सूक्ष्म सेमीकंडक्टर चिप है। जिस प्रकार बीसवीं सदी के वैश्विक भू-राजनीतिक एवं आर्थिक समीकरणों को कच्चे तेल की उपलब्धता और नियंत्रण ने आकार दिया था, ठीक उसी प्रकार आज की डिजिटल और कृत्रिम बुद्धिमत्ता चालित दुनिया में सेमीकंडक्टर चिप्स वैश्विक शक्ति का नया केंद्र बन चुके हैं। स्मार्टफोन, इलेक्ट्रानिक उपकरणों से लेकर आटोमोबाइल, रक्षा प्रणालियों, एयरोस्पेस, चिकित्सा उपकरणों, संचार और उन्नत सुपरकंप्यूटिंग तक, आधुनिक जीवन का शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र बचा हो, जो इन सूक्ष्म सिलिकान चिप्स पर निर्भर न हो। ऐसे निर्णायक दौर में भारत ने केवल एक उपभोक्ता राष्ट्र बने रहने के बजाय स्वयं को सेमीकंडक्टर निर्माण के वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने का जो संकल्प लिया है, उसे 'सेमीकान इंडिया' पहल के नाम से जाना जाता है।

भारत सरकार ने देश को सेमीकंडक्टर निर्माण का एक मजबूत वैश्विक केंद्र बनाने के लिए प्रारंभिक वित्तीय परिव्यय के साथ 'राष्ट्रीय सेमीकंडक्टर मिशन' और सेमीकान इंडिया कार्यक्रम की आधारशिला रखी है। वैश्विक सेमीकंडक्टर सम्मेलन 'सेमीकान इंडिया 2026' के मंच से प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन ने भारत के इस परिवर्तनकारी संकल्प को वैश्विक विश्वसनीयता प्रदान की। सेमीकंडक्टर विनिर्माण प्रक्रिया को मुख्य रूप से तीन चरणों में विभाजित किया जाता है- डिजाइनिंग, फैब्रिकेशन और संयोजन एवं पैकेजिंग। भारत की रणनीतिक योजना इन तीनों चरणों को समानांतर रूप से मजबूत करने की है। भारत के पास पहले से ही चिप डिजाइनिंग की क्षमता मौजूद है। दुनिया की लगभग सभी प्रमुख चिप डिजाइन कंपनियों के बड़े अनुसंधान और विकास केंद्र भारत में स्थित हैं। सेमीकान इंडिया के अंतर्गत शुरू की गई 'डिजाइन-संबद्ध प्रोत्साहन' योजना का उद्देश्य घरेलू स्तर पर भारतीय स्टार्टअप्स और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों को अपनी बौद्धिक संपदा विकसित करने और स्वदेशी चिप्स डिजाइन करने के लिए वित्तीय और तकनीकी संसाधन प्रदान करना है।

जब भारतीय इंजीनियरों द्वारा भारत में ही चिप्स डिजाइन किए जाएंगे और उनका निर्माण भी घरेलू संयंत्रों में होगा, तब वास्तविक रूप में तकनीकी स्वावलंबन का सपना साकार होगा। फैब्रिकेशन और संयोजन के स्तर पर भारत ने जिस त्वरित गति से कदम बढ़ाए हैं, वह आधुनिक औद्योगिक इतिहास में अभूतपूर्व है। असेंबली, टेस्टिंग और पैकेजिंग इकाइयां सेमीकंडक्टर मूल्य शृंखला का वह महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन इकाइयों की स्थापना से भारत को त्वरित सफलता मिल रही है, जिससे देश में बुनियादी औद्योगिक ढांचा तैयार हो रहा है और साथ ही हजारों उच्च-कुशल रोजगार के अवसर पैदा हो रहे हैं। इसके समानांतर, उच्च-स्तरीय सिलिकान वेफर फैब्रिकेशन संयंत्रों की स्थापना से भारत उस विशिष्ट श्रेणी वाले देशों के समूह में शामिल होने जा रहा है, जिनके पास उन्नत नैनोमीटर स्तर की चिप्स बनाने की क्षमता है।

सेमीकंडक्टर उद्योग दुनिया के सबसे कठिन और अनिश्चित उद्योगों में से एक माना जाता है। आज जो तकनीक अत्याधुनिक है, वह पांच साल बाद पुरानी और अप्रासंगिक हो सकती है। ऐसे में भारत को न केवल वर्तमान तकनीकों जैसे 28 नैनोमीटर, 40 नैनोमीटर या उससे अधिक के पारंपरिक चिप्स जो आटोमोबाइल और बिजली उपकरणों में प्रयुक्त होते हैं, पर ध्यान केंद्रित करना होगा, बल्कि अगली पीढ़ी की तकनीकों जैसे दो नैनोमीटर, गैलियम नाइट्राइड, सिलिकान कार्बाइड और सिलिकान फोटोनिक्स आधारित यौगिक सेमीकंडक्टर्स में भी अनुसंधान और विकास को निरंतर गति देनी होगी। इसके लिए सतत वित्तीय निवेश, दीर्घकालिक नीतिगत निरंतरता और निजी उद्योगों के बीच अटूट तालमेल की आवश्यकता है। एक और प्रमुख चुनौती पर्यावरण और बुनियादी ढांचे से जुड़ी है। सेमीकंडक्टर विनिर्माण में बड़े पैमाने पर बिजली और पानी की खपत होती है। बिजली का बाधित होना या पानी में सूक्ष्म अशुद्धि का होना अरबों रुपये के सिलिकान वेफर्स को एक झटके में नष्ट कर सकता है। इसलिए भारत को अपने सेमीकंडक्टर पार्कों में निर्बाध, विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा और शून्य-दोष गुणवत्ता सुनिश्चित करनी होगी। साथ ही, हरित ऊर्जा और जल पुनर्चक्रण की टिकाऊ तकनीकों को अपनाना होगा, ताकि यह औद्योगिक प्रगति पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव न डाले।

सेमीकान इंडिया का लक्ष्य केवल पारंपरिक सिलिकान-आधारित चिप्स तक सीमित नहीं है। भारत भविष्य की तकनीकों, जैसे क्वांटम कंप्यूटिंग, फोटोनिक्स, आप्टोइलेक्ट्रानिक्स और एआइ के लिए विशेष रूप से डिजाइन किए गए चिप्स के क्षेत्र में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने को तत्पर है। जैसे-जैसे दुनिया 6जी संचार, स्वायत्त वाहनों, स्मार्ट ग्रिड्स और रोबोटिक्स की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे अत्यधिक कुशल और कम बिजली खपत करने वाले चिप्स की मांग तेजी से बढ़ेगी। भारत यदि समय रहते इन उभरती तकनीकों में अपनी अग्रणी स्थिति बना लेता है तो वह अगली औद्योगिक क्रांति का नेतृत्व करने वाले अग्रिम पंक्ति के देशों में शामिल हो जाएगा।

(लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी हैं)