हर्ष वी. पंत। सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने सात अगस्त को एक समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। मक्का समझौता नाम से हुआ यह करार पश्चिम एशिया के सामरिक परिदृश्य की दृष्टि से एक अहम पड़ाव माना जा रहा है। समझौते के अनुसार इसमें शामिल किसी भी देश पर सशस्त्र हमला सभी तीनों पर हमला माना जाएगा।

इसमें खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान, संयुक्त युद्धाभ्यास, सैन्य प्रशिक्षण और रक्षा-औद्योगिक साझेदारी को मजबूती देने की बात भी कही गई है। भारत के दृष्टिकोण से इस समझौते को देखें तो सीधे तौर पर यह उसके विरुद्ध कोई लामबंदी नहीं, लेकिन इस चिंता को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि यह पश्चिम एशिया के तेजी से बदलते सुरक्षा ढांचे में पाकिस्तान की स्थिति को मजबूत कर सकता है।

इसमें भारत के समक्ष वास्तविक चुनौती यह सुनिश्चित करने की होगी कि सऊदी-तुर्किये-पाकिस्तान के बीच आकार लेता यह सुरक्षा गठजोड़ फारस की खाड़ी के देशों के साथ भारत के बढ़ते सामरिक और आर्थिक संबंधों के आड़े न आए।

इस समझौते को बढ़ते क्षेत्रीय असंतुलन और पश्चिम एशिया में अमेरिकी सुरक्षा भूमिका के भविष्य को लेकर बनी अनिश्चितता के परिप्रेक्ष्य में बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल की कार्रवाई के दुष्प्रभावों, खाड़ी क्षेत्र के बुनियादी ढांचे एवं समुद्री मार्गों पर ईरान और उसके पाले-पोसे गुटों के हमलों तथा होर्मुज जलमार्ग एवं लाल सागर की सुरक्षा को लेकर उपजी चिंताओं ने इस क्षेत्र की मौजूदा सुरक्षा व्यवस्थाओं में विसंगतियों को उजागर किया है।

जहां तक इस समझौते का प्रश्न है तो तीनों हस्ताक्षरकर्ता देश एक-दूसरे की सैन्य एवं आर्थिक ताकतों को परस्पर क्षमताओं से संतुलित करते हैं। सऊदी अरब की शक्ति उसकी आर्थिक समृद्धि, ऊर्जा प्रभाव और भौगोलिक स्थिति है तो तुर्किये की ताकत उसकी नाटो सदस्यता एवं निरंतर उन्नत हो रहा रक्षा उद्योग है, जबकि पाकिस्तान के साथ भारी-भरकम सैन्य बल, परमाणु क्षमता और खाड़ी देशों में दीर्घकालिक सैन्य प्रशिक्षण एवं सुरक्षा सहयोग के अनुभव जैसे पहलू जुड़े हुए हैं।

क्षमताओं का यह संयोजन इस समझौते को व्यावहारिक और रणनीतिक उपयोगिता प्रदान करता है। सऊदी अरब का वित्तीय सहयोग तुर्किये की रक्षा तकनीकों को संबल दे सकता है तो पाकिस्तान सैन्य शक्ति, प्रशिक्षण और तकनीकी विशेषज्ञता मुहैया करा सकता है। ऐसे में नाटो सरीखी किसी औपचारिक सामरिक संरचना का स्वरूप लिए बिना ही यह व्यवस्था चरणबद्ध रूप से एक एकीकृत सुरक्षा तंत्र को आकार तो दे ही सकती है।

इस घटनाक्रम में भारत के लिए यह सवाल कोई मायने नहीं रखता कि क्या यह गठजोड़ 'सुन्नी नाटो' बनेगा या नहीं, क्योंकि ऐसी किसी पहचान से तो ये तीनों देश ही इन्कार कर रहे हैं। भारत के संदर्भ में यही सबसे महत्वपूर्ण है कि क्या इसकी आड़ में पाकिस्तान को अपने नापाक मंसूबे सिरे चढ़ाने को कोई गुंजाइश तो नहीं मिल जाएगी? पाकिस्तान को इस समझौते से काफी लाभ होने की उम्मीद है।

उसकी भागीदारी न केवल इस्लामाबाद को खाड़ी क्षेत्र के सुरक्षा ढांचे में मजबूती से स्थापित कर सकती है, बल्कि उसे एक ऐसा मंच भी प्रदान करेगी जहां से वह स्वयं को केवल एक दक्षिण एशियाई सैन्य शक्ति से परे एक बड़े वैश्विक खिलाड़ी के रूप में पेश कर सके। हालांकि इसका यह अर्थ नहीं कि भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव में सऊदी अरब या तुर्किये सीधे दखल देंगे। उनके अपने राष्ट्रीय हित ही बहुत जटिल हैं।

तुर्किये को ईरान, यूरोप, खाड़ी और दक्षिण एशिया के साथ अपने समीकरणों को संतुलित रखना पड़ता है तो सऊदी अरब के भारत के साथ प्रगाढ़ आर्थिक एवं रणनीतिक रिश्ते हैं, जिनमें पिछले कुछ वर्षों के दौरान प्रगाढ़ता और बढ़ी है। ऐसे में इसके कोई आसार नहीं दिखते कि सऊदी अरब इस समझौते की आड़ में पाकिस्तान को भारत के विरुद्ध कोई षड्यंत्र करने की अनुमति प्रदान करे।

अब जब यह समझौता हो गया है तो भारत को चाहिए कि वह सऊदी के साथ अपने संबंधों को और मजबूत बनाए ताकि खाड़ी क्षेत्र में पाकिस्तान की वजह से भारत की स्थिति किसी भी प्रकार से कमजोर न हो। खाड़ी क्षेत्र भारत के लिए केवल ऊर्जा की दृष्टि से ही अहम नहीं, बल्कि व्यापार, निवेश के साथ ही वहां रह रहे भारतवंशियों के लिहाज से भी बेहद अहम है। कनेक्टिविटी से जुड़ी भारत की आकांक्षाएं भी एक बड़ी हद तक इस क्षेत्र पर निर्भर हैं। इसके साथ ही भारत को तुर्किये द्वारा पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य तकनीक एवं हथियारों की आपूर्ति और सऊदी अरब के वित्तीय समर्थन पर ध्यान रखना होगा।

विशेष रूप से यह देखते हुए जब इसमें दक्षिण एशिया के पारंपरिक सैन्य शक्ति संतुलन बिगड़ने का जोखिम हो। भारत को अपनी रणनीतिक गतिशीलता भी कायम रखनी होगी। सऊदी अरब, यूएई, ईरान और इजरायल के साथ एक साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखना हमारी बहुत बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि है, जिसे क्षेत्रीय गुटबाजी के चक्कर में दांव पर नहीं लगाया जाना चाहिए। भारत को अपनी रक्षा-औद्योगिक एवं तकनीकी क्षमताओं को भी विस्तार देना होगा।

समग्रता में देखें तो मक्का समझौता न तो भारत-विरोधी खेमेबंदी है और न ही इससे पश्चिम एशिया में एकाएक कोई नया सैन्य गुट वजूद में आ गया है। इसका तात्कालिक उद्देश्य क्षेत्रीय अस्थिरता और भावी सुरक्षा परिदृश्य के अनिश्चित बादलों के बीच तीनों देशों को एक-दूसरे का रणनीतिक सुरक्षा-कवच मुहैया कराना है। जबकि भारत के लिए यह समझौता खाड़ी क्षेत्र के बदलते सुरक्षा परिदृश्य को पूरी गंभीरता से लेने की आवश्यकता को ही रेखांकित करता है।

इस संदर्भ में भारत को न तो हड़बड़ाने की जरूरत है और न ही लापरवाह होने की। भारत को इतना ही करना है कि वह सऊदी अरब और खाड़ी देशों से संबंध और मजबूत करे, पाकिस्तान-तुर्किये सामरिक जुगलबंदी पर नजर रखे, समुद्री सुरक्षा बढ़ाने के साथ ही क्षेत्र के विरोधी खेमों से एक साथ संवाद साधने की अपनी क्षमता और बढ़ाए।

(लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में उपाध्यक्ष हैं)