स्वतंत्रता दिवस समारोह पर अपने मुख्यालय में संपूर्ण वंदे मातरम् के गायन को लेकर जो विवाद पैदा हुआ, उसके लिए कांग्रेस अपने अलावा अन्य किसी को दोष नहीं दे सकती। कांग्रेस कुछ भी सफाई दे, यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि उसे वंदे मातरम् के संपूर्ण गायन की नई परिपाटी रास नहीं आई।

गत दिवस गृह मंत्री अमित शाह ने जिस तरह सोनिया गांधी की ओर से कथित तौर पर वंदे मातरम् के गायन को रोके जाने पर कांग्रेस से माफी की मांग की, उससे यही लगता है कि कांग्रेस ने जाने-अनजाने भाजपा के हाथ में एक मुद्दा थमा दिया। यह विवाद आसानी से थमने वाला नहीं, इसका संकेत इससे भी मिलता है कि बंकिम चंद्र के वंशज ने भी सोनिया गांधी से माफी की मांग कर दी।

वंदे मातरम् को लेकर कोई पहली बार विवाद नहीं खड़ा हुआ। इस राष्ट्रीय गीत को लेकर रह-रहकर विवाद का विषय बनाने की कोशिश होती ही रही है। हाल में जब वंदे मातरम् के डेढ़ सौ साल पूरे होने पर मोदी सरकार ने उसके सभी छंद गाए जाने को अनिवार्य बनाया तब भी कांग्रेस ने उस पर आपत्ति जताई थी। इसके उपरांत जब राष्ट्रगान जन-गण-मन की तरह वंदे मातरम् को कानूनी संरक्षण देने संबंधी विधेयक पर संसद में चर्चा हुई तब भी कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों ने उसमें भाग लेने से इन्कार किया।

15 अगस्त के समारोह में केरल सरकार ने वंदे मातरम् के संपूर्ण गायन से इन्कार करके इस विवाद की जो शुरुआत की, उसे कांग्रेस मुख्यालय में हुए घटनाक्रम ने पूरा कर दिया। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले पर आयोजित समारोह में राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे ने हिस्सा लेने से किनारा किया। उन्होंने ऐसा दूसरी बार किया।

यह समझ आता है कि कांग्रेस को मोदी सरकार की रीति-नीति पसंद नहीं, लेकिन सरकार की रीति-नीति और राष्ट्रीय प्रतीकों में अंतर होता है। कांग्रेस एवं अन्य विपक्षी दलों की ओर से प्राय: इस अंतर को भुला दिया जाता है। इससे राष्ट्रीय प्रतीकों के साथ-साथ राष्ट्रीयता की भावना का भी अनादर होता है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिस कांग्रेस ने स्वतंत्रता आंदोलन का नेतृत्व किया और जिसने अपने अधिवेशनों में वंदे मातरम् के गायन की परंपरा प्रारंभ की, वही उसे यथोचित सम्मान देने के लिए तैयार नहीं दिख रही है।

मुस्लिम लीग के विरोध के बाद वंदे मातरम् के संपूर्ण गायन की जगह उसके दो छंद ही गाने की परंपरा शुरू हुई थी, लेकिन अब इस परंपरा को बदल कर वंदे मातरम् के सभी छंद गाए जाने का नियम बनाने पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह आपत्ति किसी न किसी स्तर पर मुस्लिम लीग वाली मानसिकता को पोषण देने वाली ही है।