विचार: डाटा सेंटर के लिए बने राष्ट्रीय नीति
भारत में तेजी से बढ़ते डेटा सेंटरों की डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए आवश्यकता पर प्रकाश डाला गया है, लेकिन बिजली, पानी और पर्यावरण पर उनके बढ़ते दबाव को भी उजागर किया गया है
HighLights
डेटा सेंटर डिजिटल अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण, पर संसाधन चुनौती।
बिजली, पानी की खपत और पर्यावरणीय प्रभाव चिंताजनक।
संतुलित विकास हेतु राष्ट्रीय हरित नीति की तत्काल आवश्यकता।
डॉ. सुरजीत सिंह। आने वाले वर्षों में किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसके प्राकृतिक संसाधनों से अधिक उसके डिजिटल संसाधनों से तय होगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआइ, क्लाउड कंप्यूटिंग, डिजिटल बैंकिंग, डिजिटल शिक्षा, टेलीमेडिसिन, ई-गवर्नेंस, इलेक्ट्रानिक्स विनिर्माण, रक्षा, अंतरिक्ष अनुसंधान, उद्योग 4.0 जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से तेजी से विस्तारित होती डिजिटल अर्थव्यवस्था की पूरी संरचना ही डाटा पर आधारित है।
जिस प्रकार पिछली शताब्दी में तेल को अर्थव्यवस्था की धुरी माना जाता था, उसी प्रकार आज डाटा को नई अर्थव्यवस्था का ईंधन कहा जा रहा है। डाटा को सुरक्षित रखने, संसाधित करने और हर क्षण उपलब्ध कराने के लिए विशाल डाटा सेंटरों की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि भारत सहित पूरी दुनिया में डाटा सेंटरों के निर्माण की प्रतिस्पर्धा तेज हो गई है। इसके लिए केंद्र सरकार डिजिटल इंडिया, डाटा लोकलाइजेशन और एआई मिशन जैसी पहलों के माध्यम से इस क्षेत्र को बढ़ावा दे रही है, जबकि महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, गुजरात, कर्नाटक और अन्य राज्यों ने अपनी-अपनी डाटा सेंटर नीतियां बनाई हैं।
इनका उद्देश्य निवेश आकर्षित करना, अनुमोदन प्रक्रिया को सरल बनाना, कर प्रोत्साहन देना और भारत को वैश्विक डाटा एवं एआइ हब बनाना है। अगले एक दशक में कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रसार के कारण डाटा सेंटरों की संख्या और क्षमता दोनों में तेज वृद्धि होगी। यदि भारतीय नागरिकों, बैंकों, अस्पतालों, विश्वविद्यालयों और सरकारी संस्थाओं का डाटा देश के भीतर सुरक्षित रहेगा तो डिजिटल संप्रभुता भी मजबूत होगी।
हालांकि एक से पांच मेगावाट के छोटे से डाटा सेंटर को बनाने के लिए एक से पांच मेगावाट की निरंतर विद्युत आपूर्ति के साथ लगभग दो से 10 लाख लीटर प्रतिदिन पानी की आवश्यकता होती है। इसलिए यह प्रश्न बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि भारत में जिस गति से डाटा सेंटर स्थापित हो रहे हैं, क्या उसके लिए हमारे पास पर्याप्त बिजली, पानी और पर्यावरणीय क्षमताएं उपलब्ध हैं? भारत पहले से जल संकट, ऊर्जा मांग और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। आज डाटा सेंटरों का विकास राष्ट्रीय हित में आवश्यक है, मगर यह प्राकृतिक संसाधनों की कीमत पर नहीं होना चाहिए।
डाटा सेंटरों को लेकर चिंता केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक बहस का विषय बन चुकी है। भारत में महाराष्ट्र के ठाणे और नवी मुंबई में भूमि उपयोग, बिजली की बढ़ती मांग, यातायात और पर्यावरणीय प्रभाव को लेकर स्थानीय स्तर पर विरोध और चिंताएं सामने आई हैं। आंध्र प्रदेश में प्रस्तावित डाटा सेंटर परियोजनाओं के लिए भूमि अधिग्रहण के विरुद्ध किसानों ने विरोध दर्ज कराया, जबकि चेन्नई और राजस्थान जैसे क्षेत्रों में जल संकट और संसाधनों की उपलब्धता को लेकर विशेषज्ञ लगातार सवाल उठा रहे हैं।
इसी प्रकार आयरलैंड में बिजली ग्रिड पर बढ़ते दबाव के कारण नए डाटा सेंटरों पर कड़े प्रतिबंध लगाए गए। नीदरलैंड में कृषि भूमि और ऊर्जा खपत को लेकर व्यापक विरोध हुआ, जबकि सिंगापुर ने ऊर्जा और भूमि की सीमाओं को देखते हुए कुछ समय तक नई परियोजनाओं पर रोक लगा दी। वहीं स्पेन और चिली में जल संसाधनों पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर स्थानीय समुदायों ने विरोध जताया।
स्पष्ट है कि विवाद का कारण स्वयं डाटा सेंटर नहीं, बल्कि उनका स्थान चयन, ऊर्जा और पानी की उपलब्धता तथा पर्यावरणीय प्रबंधन है। इसलिए भारत को भी ऐसी नीति अपनानी होगी, जो डिजिटल विकास और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
भारत में अभी तक डाटा सेंटरों के लिए कोई समग्र राष्ट्रीय नीति या अलग कानून लागू नहीं है। जबकि डाटा सेंटर जैसे रणनीतिक क्षेत्र के लिए एकसमान राष्ट्रीय दृष्टिकोण की आवश्यकता है। सबसे पहले स्थान चयन को वैज्ञानिक आधार पर तय किया जाना चाहिए, ताकि पानी और बिजली संकट वाले क्षेत्रों में अनियोजित विस्तार न हो। देश को संसाधनों की उपलब्धता के आधार पर ग्रीन, येलो और रेड जोन में विभाजित किया जा सकता है।
इसके साथ ही शोधित अपशिष्ट जल, वर्षा जल संचयन, कम जल-खपत वाली शीतलन तकनीकों और जल उपयोग दक्षता के राष्ट्रीय मानकों को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। बढ़ती ऊर्जा आवश्यकता को देखते हुए डाटा सेंटरों को चरणबद्ध रूप से सौर, पवन, जलविद्युत तथा छोटे माड्यूलर परमाणु रिएक्टर जैसी स्वच्छ ऊर्जा से जोड़ने की स्पष्ट रणनीति अपनानी होगी। उपजाऊ कृषि भूमि के बजाय औद्योगिक और बंजर भूमि को प्राथमिकता दी जाए तथा प्रत्येक परियोजना के लिए स्वतंत्र पर्यावरणीय, ऊर्जा और सामाजिक प्रभाव आकलन के साथ स्थानीय समुदाय की भागीदारी पारदर्शिता के साथ सुनिश्चित की जाए।
प्रश्न यह नहीं है कि डाटा सेंटर बनाए जाएं या नहीं, बल्कि यह है कि उन्हें कहां, किस तकनीक और किन संसाधनों के आधार पर स्थापित करें। यदि नीति निवेश आकर्षित करने तक ही सीमित रही और जल, ऊर्जा तथा पर्यावरणीय क्षमता का वैज्ञानिक आकलन नहीं किया गया तो आने वाले वर्षों में वही डाटा सेंटर देश के लिए नई समस्याओं का कारण बन सकते हैं। इसलिए अब समय आ गया है कि भारत को निवेश आधारित नीति से आगे बढ़कर राष्ट्रीय हरित डाटा सेंटर नीति की दिशा में कदम बढ़ाने चाहिए।










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