मनु त्यागी। लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने युवा पीढ़ी यानी जेन-जी और जेन-अल्फा से सीधा संवाद किया। सरकार की नीतिगत दिशा स्पष्ट है-देश को डिजिटल, तकनीकी और मैन्यूफैक्चरिंग महाशक्ति बनाना। इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) की मुफ्त ट्रेनिंग, डाटा सेंटर, क्रिटिकल मिनरल्स की खोज और सेमीकंडक्टर चिप प्लांट्स जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में भारी निवेश किया जा रहा है।

सरकार का यह दीर्घकालिक सोच ‘विकसित भारत 2047’ के सपनों को पंख लगाने वाला है, लेकिन इस चमकदार तकनीकी भविष्य के सिक्के का एक दूसरा और बेहद स्याह पहलू भी है, जो आज देश की सड़कों पर युवाओं के आक्रोश के रूप में बार-बार दिखाई दे रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर और एआइ हब बनाने के प्रयास ऐतिहासिक हैं। सरकार चिप प्लांट्स और एआइ इकोसिस्टम के लिए लाखों करोड़ रुपये खर्च कर रही है।

नीति-निर्माताओं का मानना है कि इन आधुनिक उद्योगों से देश में लाखों ‘हाई-एंड’ नौकरियां पैदा होंगी, लेकिन इस तथ्यात्मक सच से भी मुंह नहीं फेरा जा सकता कि ये उद्योग अत्यधिक पूंजी-गहन हैं, न कि श्रम-गहन। एक सेमीकंडक्टर प्लांट में अरबों रुपये का निवेश होता है, लेकिन वहां प्रत्यक्ष रोजगार कुछ हजार सुपर-स्पेशलाइज्ड इंजीनियरों को ही मिलता है। ऐसे में सवाल उठता है कि देश में सामान्य स्नातक पास फौज का क्या होगा? जो हर साल डिग्री लेकर रोजगार के बाजार की कतार में खड़ी हो रही है।

आंकड़ों के आईने में शिक्षित बेरोजगारी का सच: आर्थिक मोर्चे पर युवाओं की स्थिति को समझने के लिए सरकारी और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आंकड़े आंखें खोलने वाले हैं। इंडिया स्किल्स की एक रिपोर्ट बताती है कि कालेजों से निकलने वाले 50 प्रतिशत से अधिक युवा आज भी उद्योगों की तात्कालिक जरूरतों के हिसाब से रोजगार योग्य नहीं हैं। यानी कहीं न कहीं हमारे शैक्षणिक संस्थानों और वहां की शिक्षा प्रणाली में विसंगतियां हैं।

जेन-जी और जेन-अल्फा युवाओं में बढ़ रहे असंतोष और उनके सड़कों पर उतरने की सबसे बड़ी और तात्कालिक वजह घरों में अभिभावकों के सपनों से जन्म लेने वाली लालसा और इंटरनेट मीडिया की होड़ तो है ही, इसके लिए कहीं न कहीं देश की चरमराई परीक्षा प्रणाली भी बराबर की दोषी है। पेपर लीक जैसी विसंगतियां इन युवाओं की बेचैनी स्वाभाविक रूप से बढ़ाती हैं। एक विश्लेषण के मुताबिक, पिछले पांच वर्षों में देश के 15 से अधिक राज्यों में 40 से ज्यादा बड़ी सरकारी भर्ती परीक्षाओं के प्रश्नपत्र लीक हुए हैं।

नीट-यूजी, यूजीसी-नेट और विभिन्न राज्यों की सिपाही एवं प्रशासनिक भर्ती परीक्षाओं में हुई धांधलियों ने देश के लगभग 1.5 करोड़ से अधिक युवाओं को कहीं न कहीं मानसिक तनाव तो दिया ही है, शैक्षणिक प्रणाली के प्रति उनके विश्वास को भी क्षति पहुंचाई है। यदि यह व्यवस्था ठीक होती, तो इस बड़े तबके के बीच असंतोष की चिंगारी इतनी गहरी नहीं होती और इसका लाभ उठाने वाले राजनीतिक दलों को बैठे-बिठाए अवसर नहीं मिलता। पेपर लीक होना, फिर परीक्षा का रद होना, अदालती मुकदमेबाजी और दोबारा जांच के इस चक्रव्यूह में युवाओं की उत्पादक उम्र के स्वर्णिम वर्ष व्यर्थ हो रहे हैं।

सरकार ने संसद में ‘सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026’ पारित कर पेपर लीक के खिलाफ पांच करोड़ रुपये तक के जुर्माने और 10 वर्ष तक की जेल का प्रविधान किया है, लेकिन कानून केवल कागजी ढाल नहीं हो सकते, उन्हें जमीन पर बेहद कड़ाई से लागू करना होगा। ‘विकसित भारत’ का जो रास्ता सेमीकंडक्टर और एआइ की आधुनिक प्रयोगशालाओं से होकर गुजरता है, उसकी पहली सीढ़ी परीक्षा केंद्रों की शुचिता और पारदर्शिता से ही शुरू होती है।

कोचिंग के भंवर से निकल ही बनेगा भविष्य: पीएम मोदी का संदेश है कि भारत का युवा अब केवल पारंपरिक सरकारी नौकरियों या डिग्रियों की अंधी दौड़ में अपना जीवन बर्बाद नहीं करेगा। सरकार की नई नीतियां जैसे ‘पीएम इंटर्नशिप योजना’ और कौशल विकास के नए अवसर, सीधे तौर पर उस ‘कोचिंग संस्कृति’ की जड़ों पर प्रहार करती हैं, जिसने दशकों से देश के युवाओं को बंधक बना रखा है। निश्चित ही, ये घोषणाएं उम्मीद जगाती हैं कि अब अरबों रुपये के इस कोचिंग बाजार को मात मिलेगी और देश का युवा आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेगा।

कोचिंग के बाजार ने समाज को किस कदर प्रभावित किया है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कोचिंग संस्थानों ने आज देश में एक समानांतर और अनियंत्रित साम्राज्य खड़ा कर लिया है। इसने हमारे सामाजिक ताने-बाने को भी बहुत गहरे जख्म दिए हैं। आज एक बच्चे का बचपन 10वीं या 12वीं कक्षा में नहीं, बल्कि छठी और सातवीं कक्षा से ही कोचिंग के भंवर में फंस जाता है। पहले 10वीं-12वीं तक छात्र वर्ग का बड़ा तबका ट्यूशन या कोचिंग की शक्ल तक नहीं देखता था’ लेकिन बीते एक दशक में यह परिदृश्य पूरी तरह बदल चुका है। अब कोचिंग एक स्टेटस सिंबल बन गई है। कोचिंग संस्थान छात्रों को इंसान नहीं, बल्कि केवल ‘रैंक’ और ‘रोल नंबर’ के रूप में देखने लगे हैं। इस माहौल में पला-बढ़ा युवा समाज के प्रति संवेदनशील होने के बजाय धीरे-धीरे अधिक आत्मकेंद्रित और रोबोटिक होता जा रहा है।

कोचिंग के इस बाजार को खाद-पानी कहीं और से नहीं, बल्कि माता-पिता की अधूरी आकांक्षाओं और सामाजिक दिखावे से मिलता है। आज बच्चे की शिक्षा उसकी रुचि के अनुसार नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि शर्मा जी या वर्मा जी के बेटे ने कौन-सा कोर्स चुना है। हर साल केवल एक से दो प्रतिशत बच्चों का चयन ही आइआइटी, एम्स या यूपीएससी जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं में हो पाता है। शेष 98 प्रतिशत युवा खुद को ‘नाकाम’ मानने लगते हैं। एक सच इस समाज को समझना होगा कि हर बच्चा आइंस्टीन या सचिन तेंदुलकर नहीं हो सकता।

युवाओं का स्कोर बोर्ड-लाइक्स, कमेंट, फालोअर्स

जिंदगी में कोई भी सफलता एक दिन में नहीं मिलती। क्रिकेट की तरह जीवन भी लंबी पारी का खेल है। दिन का खेल खत्म होने पर नाबाद बल्लेबाज पवेलियन लौटता जरूर है, लेकिन उसके मन में अगली पारी के रन और बेहतर प्रदर्शन की तैयारी होती है। आज के युवा भी जिंदगी की ऐसी ही पारी खेल रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि उनके हाथ में बल्ले के बजाय स्मार्टफोन है और सामने का स्कोरबोर्ड रन नहीं, बल्कि लाइक्स, कमेंट, व्यूज और फालोअर्स गिनता है। इंटरनेट मीडिया ने युवाओं को अभिव्यक्ति का अभूतपूर्व मंच दिया है।

प्रतिभा को पहचान मिली है, सूचनाओं तक पहुंच आसान हुई है और दुनिया से जुड़ने के अवसर बढ़े हैं। समस्या तब शुरू होती है जब आभासी दुनिया का स्कोर ही सफलता का पैमाना बन जाता है। कितने फालोअर्स हैं, कितने लाइक्स मिले, रील कितनी वायरल हुई-इन सवालों के बीच यह सवाल पीछे छूट जाता है कि व्यक्ति ने वास्तविक जीवन में कितना सीखा, कितना बनाया और समाज के लिए कितना उपयोगी साबित हुआ। युवा जीवन की सबसे महत्वपूर्ण पूंजी समय, ऊर्जा, कल्पनाशीलता और सीखने की क्षमता है। यदि इनका बड़ा हिस्सा केवल डिजिटल लोकप्रियता हासिल करने में खर्च हो रहा है, तो हमें अपने स्कोरबोर्ड को नए सिरे से देखने की जरूरत है।

असली स्कोर यह होना चाहिए कि कितनी किताबें पढ़ीं, कितने कौशल सीखे, कितनी चुनौतियों का सामना किया, कितने लोगों की मदद की और अपने भविष्य की नींव कितनी मजबूत की। भारत के लिए यह सवाल और महत्वपूर्ण है। देश की करीब आधी आबादी 29 वर्ष से कम उम्र की है। आने वाले दशकों में कामकाजी उम्र की आबादी और बढ़ेगी। यह भारत के लिए असाधारण जनसांख्यिकीय अवसर है, लेकिन युवा आबादी अपने आप जनसांख्यिकीय लाभांश नहीं बन जाती। इसके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, निष्पक्ष परीक्षाएं, रोजगार के अवसर, कौशल विकास, स्वतंत्र सोच और सुरक्षित सामाजिक वातावरण जरूरी हैं।

आज के युवा केवल नौकरी नहीं, सम्मानजनक अवसर और अपनी प्रतिभा को साबित करने का मंच चाहते हैं। उनकी बेचैनी को समझना, उनके सवालों को सुनना और उनके सपनों को अवसर देना सरकार की ही नहीं, पूरे समाज की जिम्मेदारी है। विश्वविद्यालय यदि स्वतंत्र विचार के केंद्र नहीं रहेंगे, परीक्षाओं पर भरोसा कमजोर होगा और रोजगार अवसर के बजाय विशेषाधिकार का माध्यम बन जाएगा, तो हमारी युवा शक्ति निराशा में बदल सकती है। 2047 का विकसित और स्वर्णिम भारत केवल हाई-टेक नीतियों, एआइ या आधुनिक बुनियादी ढांचे से नहीं बनेगा। उसे बनाने वाले आज के युवा होंगे।

इसलिए जरूरी है कि उनके हाथ में स्मार्टफोन के साथ किताब भी हो, रील के साथ वास्तविक कौशल भी हो और फालोअर्स के साथ अपना स्वतंत्र विचार भी। याद रखना होगा-कोई भी टीम केवल स्कोरबोर्ड देखकर मैच नहीं जीतती। जीत के लिए ड्रेसिंग रूम में प्रतिभाओं की अगली कतार तैयार करनी पड़ती है। भारत का असली स्कोर भी लाइक्स और फालोअर्स में नहीं, बल्कि सक्षम, संवेदनशील, स्वतंत्र और आत्मविश्वासी युवाओं में दर्ज होगा। भविष्य की चिंता जरूरी है, लेकिन भविष्य से पहले वर्तमान आता है। सुफल वर्तमान ही स्वर्णिम भविष्य की नींव रखता है।