आदित्य सिन्हा। अपने आसपास किसी सब्जी के ठेले, टी-स्टाल या दवाई की दुकान या किसी भी अन्य प्रतिष्ठान पर नजर डालिए तो बहुत संभव है कि आपको वहां यूपीआइ क्यूआर कोड नजर आए। केवल जुलाई 2026 में ही भारत में 29.9 लाख करोड़ रुपये के 2,366 करोड़ यूपीआइ लेनदेन हुए। भारत का बनाया हुआ यह एक ऐसा सिस्टम है, जिसे पूरी दुनिया सराहती है। चूंकि लगभग सभी लोग इसका उपयोग करते हैं, इसलिए जब अगस्त में संसद ने कुछ यूपीआइ भुगतानों को शुल्क के दायरे में लाने संबंधी कानून को हरी झंडी दिखाई तो उस पर आक्रोश दिखा। लोगों को लगा कि उनसे मुफ्त सुविधा छीनी जा रही है। यह भाव बहुत ही स्वाभाविक है। इसके पीछे तमाम पहलू उत्तरदायी हैं।

कानून में जिस शुल्क का उल्लेख है वह मर्चेंट डिस्काउंट रेट या एमडीआर है, जिसका भुगतान उपभोक्ता नहीं, बल्कि व्यापारी को करना होगा। यह शुल्क 2,000 रुपये से अधिक के भुगतान और बड़े कारोबारियों पर ही लागू होगा। किसी मित्र, परिचित या परिवार के सदस्य को होने वाला सामान्य भुगतान पहले की ही तरह शुल्क मुक्त रहेगा। छोटे दुकानदारों को भी भुगतान पर कोई शुल्क नहीं देना होगा। शुल्क की 0.25 प्रतिशत से 0.4 प्रतिशत की प्रस्तावित दर भी बहुत कम है। कार्ड कंपनियां तो वर्षों से दुकानदारों से भुगतान के एवज में कहीं भारी शुल्क वसूलती आ रही हैं। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या यूपीआइ सेवा हमेशा से पूरी तरह मुफ्त रही है? कतई नहीं।

प्रत्येक यूपीआइ भुगतान को पूरा करने के लिए करीब दो रुपये की लागत आती है। इस प्रक्रिया में शामिल सर्वर, इंजीनियर, फ्राड चेकिंग से लेकर पलक झपकते ही मुद्रा हस्तांतरण की सुविधा के लिए किसी और को शुल्क चुकाना पड़ता है। वर्ष 2020 से ही कानून लागू है कि यूपीआइ के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाएगा तो इन लागतों का बोझ कौन वहन करता है? इसकी अदायगी पेमेंट कंपनियां और बैंक अपनी जेब से करते हैं और कुछ हद तक करदाता भी। यूपीआइ के लिए सरकार पहले ही करीब 11,000 करोड़ रुपये खर्च कर चुकी है। स्पष्ट है कि कुछ भी पूरी तरह मुफ्त नहीं। फर्क इतना है कि बिल किसी दूसरे पते पर भेजा जाता है।

इस मुद्दे पर इतनी चर्चा क्यों आवश्यक है? ऐसा इसलिए, क्योंकि ऐसे ही कुछ मामलों में भारत के अच्छे अनुभव नहीं रहे हैं। कई राज्यों द्वारा किसानों के लिए मुफ्त बिजली का ही उदाहरण लीजिए। इससे न तो किसान बहुत फायदे में रहे और न ही बिजली कंपनियां। इसका नतीजा बिजली आपूर्ति में गतिरोध से लेकर ट्रांसफार्मर जैसे उपकरणों में व्यापक खामियों के रूप में सामने आया। मुफ्त बिजली से दिन-रात चलने वाले पंपों के कारण भूमिगत जल पर भी संकट गहराता गया। हमने अपने शहरों में पानी लगभग मुफ्त उपलब्ध कराया हुआ है। इसका नतीजा दिखता है कि नल अमूमन दो घंटे ही चलते हैं। असल में जब किसी सेवा पर राजस्व अर्जित करने के दृष्टिकोण से सीमा तय कर दी जाए तो वह धीरे-धीरे अपनी उपयोगिता गंवा देती है। फिर उसमें न तो कोई निवेश करने के लिए आगे आता है और न ही कोई उसे बेहतर बनाने का प्रयास करता है। ऐसी सेवा केवल सरकारी अनुकंपा पर चल रही होती है। देखा जाए तो मुफ्तखोरी का चलन ही तमाम अच्छी चीजों के पतन का कारण बनता है।

यूपीआइ इससे बेहतर की हकदार है। उसे निरंतर निवेश का सहारा चाहिए। भुगतान का दायरा बढ़ने से सर्वर भी अधिक चाहिए होंगे। धोखाधड़ी बढ़ने से दमदार सुरक्षा आवरण भी आवश्यक है। नित नए फीचर भी जोड़ने होंगे ताकि यह तकनीक समय की कसौटी पर खरी उतरे। अगर बैंकों एवं भुगतान कंपनियों को यूपीआइ से कोई कमाई नहीं होगी तो वे इस पर क्यों खर्च करेंगे? संभव है कि कुछ समय तक तो वे इसे इसी उम्मीद में सहारा देते रहें कि भविष्य में नियम बदलेंगे, लेकिन उम्मीद की गिनती किसी बिजनेस प्लान में नहीं होती। ऐसे में न्यूनतम ही सही कुछ शुल्क लगाना अनुचित नहीं। इससे करदाताओं पर इसकी निर्भरता घटेगी। यह अपनी क्षमताओं के दम पर देश के तमाम दूसरे हिस्सों में विस्तार करने में सक्षम हो सकेगा।

कुछ लोगों का कहना है कि यूपीआइ भी स्ट्रीट लाइट या रक्षा-सुरक्षा जैसे सार्वजनिक महत्व का विषय है तो सरकार को हमेशा इसे सहारा देना चाहिए। यह विचार तो अच्छा है, परंतु इसमें तार्किकता कम है। स्ट्रीट लाइटिंग सार्वभौमिक सुविधा है, लेकिन भुगतान निजी सेवा है। इसमें क्रेता और विक्रेता बंधे होते हैं और हर भुगतान के साथ ही कुछ खर्च भी जुड़ा होता है। अगर कोई बड़ा प्रतिष्ठान 8,000 रुपये का भुगतान प्राप्त करता है तो उससे 25 से 30 रुपये का भुगतान शुल्क लेने में कुछ हर्ज नहीं। जब कोई प्रतिष्ठान बिजली से लेकर दुकान के किराये और कर्मियों के लिए खर्च करता है तो फिर भुगतान के लिए भी प्रविधान कर सकता है।

एक आशंका यह है कि यूपीआइ पर शुल्क लगाने से नकदी पर निर्भरता फिर से बढ़ेगी, लेकिन नकदी से जुड़ी दिक्कतें भी कम नहीं हैं। एटीएम की लाइन में लगना, नोटों को गिनना एवं संभालना और भुगतान की प्रक्रिया में छुट्टे के लिए बहस करना। खुदरा व्यापारी इसलिए भी यूपीआइ चाहते हैं, क्योंकि इससे नकदी प्रबंधन से जुड़े खर्च और जोखिम घट जाते हैं। ऐसे में यूपीआइ पर 0.25 प्रतिशत का मामूली शुल्क लोगों को वापस नकदी की ओर रुख करने पर शायद ही मजबूर करे। वैसे भी एक बार सुविधा की आदत पड़ जाए तो वह मुश्किल से ही छूटती है।

रही बात इस डर की कि व्यापारी यह चार्ज ग्राहकों से वसूलेंगे, तो शायद कुछ व्यापारी शुरुआत में ऐसा करने की सोचें भी। हालांकि कड़ा मुकाबला उन्हें ऐसा करने नहीं देगा। अगर एक दुकानदार चार्ज लगाएगा तो पड़ोस वाला बिना शुल्क लिए उस ग्राहक को तोड़ लेगा। पिछले कई दशकों से क्रेडिट और डेबिट कार्ड के साथ जुड़े शुल्कों के मामले में यही होता रहा है। असल में व्यापार जगत इसे अपने कारोबारी खर्च का एक अंतर्निहित हिस्सा समझकर उसका बोझ खुद वहन कर लेता है। समग्रता में देखें तो हर किसी सेवा-सुविधा के साथ कुछ शुल्क तो जुड़ा ही रहता है। अगर यह शुल्क स्पष्ट है तो उसमें ईमानदारी का भाव रहेगा, लेकिन दबे-छिपे रूप में शायद ऐसा संभव न हो। अगर यूपीआइ के साथ भी शुल्क को लेकर स्पष्टता बनती है तो बेहतर होगा। अन्यथा बिजली और पानी से जुड़े प्राधिकरणों की स्थिति तो हमने देखी ही है।

(लेखक लोक-नीति विश्लेषक हैं)