जागरण संपादकीय: संदेह का निराकरण
वैसे तो तीनों चुनाव आयुक्तों की बैठक और उसके बाद जारी बयान ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ छेड़े गए विपक्ष के अभियान की हवा निकाल दी है, लेकिन यह तय है कि वह चुप नहीं बैठने वाला।
HighLights
चुनाव आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर उठे संदेहों का निराकरण किया।
सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए, कोई मतभेद नहीं।
मतदाता सूचियों का विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) जारी रहेगा।
यह आवश्यक था कि चुनाव आयोग उस खबर का संज्ञान लेता कि मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यशैली से दोनों चुनाव आयुक्त नाखुश हैं और वे उनके फैसलों पर असहमति दर्ज कराते रहे हैं। हालांकि ऐसी खबर आने के बाद चुनाव आयोग ने यह स्पष्टीकरण जारी किया था कि जो भी फैसले लिए गए, वे सहमति से लिए गए, लेकिन इसके बाद भी यह संदेह खड़ा किया गया कि क्या इस स्पष्टीकरण पर दोनों आयुक्तों की भी सहमति है? गत दिवस तीनों चुनाव आयुक्तों ने बैठक कर न केवल इस संदेह का निराकरण किया, बल्कि उन अनेक प्रश्नों के उत्तर भी दिए, जो चुनाव आयोग के कामकाज और विशेष रूप से मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर उठे थे।
वास्तव में यह संभव ही नहीं कि मुख्य चुनाव आयुक्त अपने हिसाब से फैसले ले सकें, क्योंकि चुनाव आयोग का प्रविधान यह कहता है कि आयोग के फैसले या तो सर्वसम्मति से होंगे या फिर बहुमत से। इस तथ्य के बाद भी तिल का ताड़ बनाया गया और एक ऐसा नैरेटिव खड़ा किया गया, मानो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के आगे दोनों चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी असहाय और निरुपाय हैं। अब यह स्पष्ट हुआ कि ऐसा नहीं है। इसी के साथ यह भी साफ हुआ कि दोनों आयुक्तों की ओर से कैबिनेट सचिव को लिखी गई चिट्ठी को गलत संदर्भ में पेश किया गया, लेकिन इसका दुष्परिणाम यह रहा कि विपक्ष ने मुख्य चुनाव आयुक्त और मोदी सरकार के खिलाफ अभियान छेड़ दिया।
वैसे तो तीनों चुनाव आयुक्तों की बैठक और उसके बाद जारी बयान ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ छेड़े गए विपक्ष के अभियान की हवा निकाल दी है, लेकिन यह तय है कि वह चुप नहीं बैठने वाला। इसका संकेत कांग्रेस के प्रवक्ता की ओर से चुनाव आयोग की प्रेस विज्ञप्ति में जो कुछ कहा गया, उससे असंतोष जताने से मिलता है। इसके अतिरिक्त इसकी भी अनदेखी न की जाए कि विपक्ष एसआईआर को वोट चोरी का नाम देकर उसके खिलाफ पहले से ही अभियान छेड़े हुए है। उसे इससे कोई फर्क नहीं पड़ रहा है कि एसआईआर के खिलाफ उसकी कोई भी दलील सुप्रीम कोर्ट के समक्ष टिक नहीं रही। इसके बावजूद उसे चैन नहीं है।
उसकी बैचेनी का कारण यह है कि उसे मनचाही चुनावी सफलता नहीं मिल रही है। वह अपनी कमजोरियों को दूर करने के स्थान पर अपनी चुनावी विफलताओं का दोष चुनाव आयोग पर मढ़ना अधिक आसान समझ रहा है। कायदे से अब जब चुनाव आयोग ने एसआईआर को और सुगम एवं सुविधाजनक बनाने के निर्णय लिए हैं, तब विपक्ष को इस प्रक्रिया में सहयोग करना चाहिए, क्योंकि वह कितना भी शोर मचाए, यह प्रक्रिया थमने वाली नहीं है। यह थमनी भी नहीं चाहिए, क्योंकि मतदाता सूचियों को शुद्ध करना समय की मांग है।



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