डॉ. विनोद यादव। धार की परमारवंशकालीन भोजशाला पर आए इंदौर हाई कोर्ट के निर्णय ने गौरवशाली मालवा संस्कृति के ख्यातिप्राप्त राजा भोज की सांस्कृतिक विरासत और उपलब्धियों को याद दिलाने का भी काम किया है। धारा नगरी में विद्वता का सम्मान, कला का उत्कर्ष और संस्कृति का वैभव था। राजा भोज ने जब धारा नगरी को अपनी राजधानी के रूप में प्रतिष्ठित किया तो उसे केवल शासन का केंद्र नहीं, बल्कि ज्ञान-परंपरा, संस्कृति, पारस्परिक सौहार्द का भव्य नगर बना दिया।

यहां निर्मित भव्य महल, देवालय और शिक्षा केंद्र भारत की समृद्ध सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं। इनमें मां सरस्वती का मंदिर सर्वप्रमुख है। सरस्वती मंदिर के निकट एक विजय-स्तंभ स्थापित कराया गया था। भोपाल के दक्षिण-पूर्व में राजा भोज ने 250 वर्ग मील लंबी भोज सरोवर नामक झील का निर्माण करवाया। चित्तौड़ में त्रिभुवन नारायण मंदिर बनवाया, मेवाड़ के नागोद क्षेत्र में भूदान किया। 1034 में सरस्वती मंदिर परिसर में उन्होंने एक संस्कृत विद्यापीठ की स्थापना कराई, जिसे आज भोजशाला के नाम से जाना जाता है। यह संस्थान नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालय की समृद्ध परंपरा के समकक्ष था और लगभग 271 वर्षों तक यह संस्थान विश्वस्तरीय शिक्षा केंद्र के रूप में बहुत प्रतिष्ठित बना रहा।

यह उल्लेखनीय है कि मध्य प्रदेश सरकार ने भोजशाला परिसर को 'सरस्वती लोक' और एक भव्य शोध संस्थान के रूप में विकसित करने का फैसला किया है। इस परियोजना के तहत भोजशाला परिसर में 'राजा भोज शोध संस्थान' स्थापित किया जाएगा, जो राजा भोज की ज्ञान परंपरा को पुनर्जीवित करने का कार्य करेगा। उचित यह होगा कि भोजशाला में अंतरराष्ट्रीय महत्व का ऐसा शैक्षिक संस्थान बने, जो प्राच्य विद्या के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरे। ऐसा इसलिए किया जाना चाहिए, क्योंकि सम्राट भोज केवल प्रतापी राजा नहीं, बल्कि विद्या, कला, साहित्य और स्थापत्य के महान संरक्षक थे। उनकी राजसभा में विभिन्न कलाओं में निष्णात पांच सौ विद्वानों को आश्रय प्राप्त था। राजा भोज ने धर्म, संस्कृति, खगोल विद्या, वास्तुकला, ज्योतिष, व्याकरण, कोश रचना, काव्य और आयुर्वेद-औषधि जैसे विभिन्न विषयों पर 84 ग्रंथों की रचना की। राजा भोज की काव्यात्मक प्रतिभा भी उच्चकोटि की थी।

इतिहास के पन्नों को पलटने पर ज्ञात होता है कि राजा भोज वीरता और विद्वता के अद्भुत संगम थे। वे रणभूमि में पराक्रमी सम्राट ही नहीं थे, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा, संस्कृति और विद्वता के महान संरक्षक थे। उनके शासनकाल को भारतीय इतिहास में स्वर्णयुग के रूप में याद किया जाता है। संस्कृत के प्रतिष्ठित विद्वान और प्रमुख इतिहासकार बल्लाल ने अपने ग्रंथ 'भोज-प्रबंध' तथा जैन आचार्य-कवि धनपाल ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ 'तिलकमंजरी' में उन्हें 'कविराज' की उपाधि से विभूषित किया। पुरातत्वविदों को भोज शासनकाल की ऐतिहासिक जानकारी देने वाले आठ अभिलेख (1011 से 1046 ई.तक के) प्राप्त हुए हैं। इनमें प्रमुख है उदयपुर-प्रशस्ति अभिलेख। इसमें उनके सफल सैन्य-अभियानों एवं तुर्कों और हूणों के विरुद्ध विजय प्राप्त करने का उल्लेख मिलता है। उदयपुर प्रशस्ति के साथ-साथ मेरुतुंग कृत 'प्रबंधचिंतामणि' से पता चलता है कि राजा भोज ने अपने समकालीन अनेक शक्तिशाली राज्यों को पराजित कर उदयाचल से अस्ताचल तक शासन किया। इस ग्रंथ में राजा भोज की विद्वता, दानशीलता और उनके द्वारा धारा नगरी में बनवाए गए 104 मंदिरों का उल्लेख मिलता है। वसंत पंचमी के दिन यहां मां वाग्देवी की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा हुई। वर्तमान में वाग्देवी की प्रतिमा लंदन के एक म्यूजियम में रखी हुई है। आशा है कि हाई कोर्ट के फैसले के बाद इस प्रतिमा को लंदन से वापस लाने के प्रयास किए जाएंगे और वे सफल भी होंगे।

समकालीन इतिहासकारों और विद्वानों ने राजा भोज को केवल प्रजावत्सल सम्राट ही नहीं, बल्कि श्रेष्ठतम साहित्यकार, कवि-सम्राट और विद्यानुरागी नरेश के रूप में वर्णित किया था। 1055 में जब राजा का देहांत हुआ तो समकालीन विद्वानों ने लिखा, 'आज राजा भोज के स्वर्ग सिधार जाने से धारा नगरी निराधार हो गई है, ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती निराश्रित हो गई हैं और समस्त विद्वतजन आहत हो गए हैं।' राजा भोज के निधन के साथ ही केवल एक शासक का अवसान नहीं हुआ था, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और विद्वता के उस युग का भी क्षय हुआ, जिसने धारा नगरी को भारतीय सभ्यता का आलोक-स्तंभ बना दिया था।

धारा नगरी का इतिहास बताता है कि किसी राष्ट्र की वास्तविक समृद्धि केवल भवनों, सेनाओं या अर्थव्यवस्था से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से तय होती है कि वहां ज्ञान-परंपरा कितनी सम्मानित है, संस्कृति को कितना संरक्षण प्राप्त है और विद्वानों को कितना आदर दिया जाता है। जिस समाज में शिक्षा, संस्कार, विचार और नवाचार को सम्मान मिलता है, वही समाज स्थायी रूप से उन्नत और सभ्य बनता है। राजा भोज का युग हमें यह प्रेरणा देता है कि सत्ता का सर्वोच्च स्वरूप वही है, जो शस्त्र के साथ-साथ शास्त्र का भी संरक्षक बने। अब यह आवश्यक हो जाता है कि धार की भोजशाला के पुराने सांस्कृतिक गौरव को बहाल किया जाए।

(लेखक इतिहासकार हैं)