अवधेश कुमार। राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम् को लेकर उभरा विवाद जिस सीमा तक बढ़ रहा है, वह चिंताजनक ही नहीं दुर्भाग्यपूर्ण भी है। कांग्रेस के दिल्ली स्थित केंद्रीय कार्यालय पर वंदे मातरम् गायन के समय का दृश्य विचलित और चकित करने वाला था। यह सच है कि कांग्रेस के कार्यालय में वंदे मातरम् पूरा गया गया, किंतु वीडियो में साफ दिख रहा है कि उसके गायन के बीच सोनिया गांधी हाथ से रोकने का इशारा कर रही हैं और असहज हैं, जैसे कुछ असामान्य हो गया हो। गायन की जिम्मेदारी संभाल रहे ललित देसाई को राहुल गांधी तथा दूसरे नेताओं के पास जाते हुए देखा जा सकता है। कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश का यह कथन हास्यास्पद था कि खरगे जी लंबे समय से खड़े थे और सोनिया जी उनके लिए कुर्सी चाह रही थीं। तीन मिनट के गीत में खरगे जी को कुर्सी की आवश्यकता कैसे महसूस हो गई? ध्यान रहे कि इसके बाद खरगे जी ने खड़े होकर भाषण दिया।

जयराम रमेश ने पत्रकारों को बताया कि 28 अक्टूबर, 1937 को कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में ही तय हुआ था कि वंदे मातरम् के केवल प्रारंभिक छंद गाए जाएंगे और तबसे कांग्रेस की यही परंपरा रही है। इस परंपरा का पालन करने की जिद तब की जा रही है, जब हाल में वंदे मातरम् को राष्ट्रगान जन-गण-मन के बराबर स्थान देने के साथ उसमें बाधा डालने या उसका किसी तरह अपमान करने पर सजा का कानून बनाया गया हो। कांग्रेस ने इस कानून से संबंधित विधेयक पर चर्चा का बहिष्कार किया था। यह मांग हो रही है कि सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी ने वंदे मातरम् के संपूर्ण गायन को जिस तरह रोका, उसके लिए उन्हें क्षमा मांगनी चाहिए, लेकिन अघोषित रूप से राहुल गांधी के नेतृत्व में चल रही कांग्रेस में वंदे मातरम् के प्रति भक्ति भाव के लिए कोई जगह नहीं दिखती। जब वे मानेंगे ही नहीं कि उन्होंने कोई गलती की है तो फिर क्षमा मांगने का प्रश्न कहां से पैदा होता है? यह आश्चर्य की बात है कि स्वतंत्रता आंदोलन में सभी विचारों और संगठनों के लिए संघर्ष का मंच बनने वाली कांग्रेस आज भारत के राष्ट्रीय गीत के वास्तविक स्वरूप को स्वीकारने को तैयार नहीं है।

1896 से लेकर 1936 तक कांग्रेस के सभी अधिवेशनों में वंदे मातरम् का पूरा गायन होता था और इसे सभी गाते थे। धीरे-धीरे मुसलमानों के एक वर्ग में विरोध बढ़ा और वे कांग्रेस अधिवेशन में खड़े रहते हुए भी उसे नहीं गाते थे। कट्टर सांप्रदायिक तथा भारत विभाजन की मांग करने वाली मुस्लिम लीग के दबाव में 1937 में इसे छोटा किया गया। जयराम रमेश और अन्य कांग्रेस नेता गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का नाम लेते हुए बताते हैं कि उनके ही सुझाव पर ऐसा किया गया। वे यह नहीं बताते कि उन्होंने यह सुझाव तब दिया, जब पंडित नेहरू और अनेक नेता दबाव में आकर कहने लगे कि जिन पंक्तियों से मुसलमानों को आपत्ति है, उन पर हमें हिंदू-मुस्लिम एकता का ध्यान देते हुए जोर नहीं देना चाहिए। तब तक जिन्ना और कांग्रेस में रहे अन्य मुस्लिम नेताओं की धारा बदल चुकी थी। इसलिए सोचा गया कि शायद ऐसा कर देने से वे मान जाएंगे। सच यह है कि उन्हें पूरे गीत पर ही आपत्ति थी और आज भी मुसलमानों का एक वर्ग वंदे मातरम् को अस्वीकार्य बताता है। कांग्रेस ऐसे ही वर्ग के सामने समर्पण कर रही है।

चूंकि केरलम में मुस्लिम लीग के साथ कांग्रेस चुनाव लड़ती है और वह सरकार में शामिल है, इसलिए वहां राष्ट्रीय गीत का गायन नहीं हुआ। कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश में यह स्थिति नहीं है, इसलिए इसे वहां गाया गया। इसकी भी अनदेखी न की जाए कि अभी प्रियंका गांधी वाड्रा केरलम की वायनाड सीट से सांसद हैं, जिनकी जीत मुस्लिम लीग के समर्थन से ही हुई है। कांग्रेस यह दिखा रही है कि वह मुस्लिम लीग का तुष्टीकरण कर रही है। 1907 में मुस्लिम लीग बनने के बाद ही वंदे मातरम् का विरोध शुरू हुआ था। विडंबना देखिए कि मुस्लिम लीग ने भारत को बांट दिया, पर उसके दबाव में लिया गया गलत फैसला कांग्रेस आज तक बनाए रखना चाहती है। जब 24 जनवरी, 1950 को वंदे मातरम् के छोटे स्वरूप को राष्ट्रीय गीत स्वीकार किया गया तो संसद के अंदर या बाहर प्रभावशाली पार्टियों और नेताओं ने सरकार पर यह दबाव नहीं बनाया कि विभाजन के बाद तो इस पूरे गीत को फिर से अपनाया जाए। पहले संसद सत्र के आरंभ और समापन में भी इसका गायन नहीं होता था। जब भाजपा शक्तिशाली हुई, तब लालकृष्ण आडवाणी तथा राम नाइक ने इसे संसद में गाने की परंपरा शुरू की।

राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी पिछले करीब सात-आठ वर्षों में अल्पसंख्यक समुदायों के कट्टरपंथी तत्वों, अतिवादी वामपंथियों, अल्ट्रा समाजवादियों और भारत को अलग-अलग भूखंडों का टुकड़ा मानने वालों के विचार पर चलती दिख रही है। कांग्रेस मान रही है कि भाजपा से टकराव में उसकी सबसे बड़ी शक्ति वे ताकतें हैं, जो भारत को एक प्राचीन राष्ट्र के रूप में स्वीकार नहीं करतीं, जिन्हें हमारे वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत आदि को इतिहास या यथार्थ ग्रंथ मानने पर आपत्ति है, जो सनातन या उसके प्रतीकों को अंधविश्वास या प्रगति विरोधी मानते हैं। सच यह है कि अब ऐसे लोग ही कांग्रेस की विचारधारा निर्धारित करते हैं।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)