चीनी के बढ़ते मूल्यों का संज्ञान लिया जाना आवश्यक था, लेकिन अच्छा होता कि सरकार तभी चेत जाती, जब चीनी के दाम बढ़ने शुरू हुए थे। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि बीते दो महीनों में चीनी के मूल्य लगभग 40 प्रतिशत बढ़ गए हैं। सरकार ने इसका कारण खराब मौसम की वजह से गन्ने की फसल को नुकसान और उसके चलते चीनी के घरेलू उत्पादन में कमी, अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी के दामों में वृद्धि आदि को बताते हुए इससे स्पष्ट रूप से इन्कार किया है कि पेट्रोल में एथनाल की मिलावट से ऐसा हुआ है।

उसके अनुसार एथनॉल के लिए इस्तेमाल होने वाली चीनी का हिस्सा घटा है। उसने यह भी साफ किया कि देश में उत्पादित होने वाले एथनाल का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा अनाज और खास तौर पर मक्के से आता है। इस सबके बाद भी उसे यह आभास होना चाहिए था कि त्योहारों को देखते हुए चीनी की मांग बढ़ेगी और जमाखोरी करने वाले इसका लाभ उठा सकते हैं। ध्यान रहे कि एक बार जब किसी आवश्यक वस्तु के दाम बढ़ने लगते हैं तो उन्हें यकायक रोकना संभव नहीं होता।

देखना है कि सरकार ने चीनी के बढ़ते दामों पर लगाम लगाने के लिए दस लाख टन चीनी का आयात करने, डीलरों के लिए भंडारण सीमा तय करने और जमाखोरों के खिलाफ कार्रवाई करने के जो कदम उठाए हैं, उनके अपेक्षित परिणाम मिल पाते हैं या नहीं?

हालांकि सरकार ने यह स्पष्ट किया कि चीनी के मूल्य बढ़ने का कारण एथनाल नीति नहीं है, लेकिन विपक्षी राजनीतिक दल यही साबित करने में जुट गए हैं। उन्हें यह मौका इसलिए भी मिला, क्योंकि खुद सरकार ने यह माना कि एथनाल मिश्रित पेट्रोल से वाहनों के माइलेज में कमी आती है। सरकार ने जिस तरह यह रेखांकित किया कि एथनाल नीति से चीनी उद्योग को लाभ मिला है और चीनी मिलों की आर्थिक स्थिति सुधरने के साथ गन्ना किसानों को भुगतान की समस्या का समाधान करने में आसानी हुई है, उससे ऐसा लगता है कि वह अपनी इस नीति पर पुनर्विचार नहीं करने वाली।

यदि यह मान लिया जाए कि एथनाल नीति चीनी के मूल्य बढ़ने का कारण नहीं है तो भी इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती कि ई-20 ईंधन विवाद का मुद्दा बन गया है। यह सही है कि एथनाल नीति से पेट्रोलियम पदार्थों के आयात में खपने वाली विदेशी मुद्रा बचाने में सफलता मिली है, लेकिन यह सही समय है कि इस नीति पर नए सिरे से विचार किया जाए और यह देखा जाए कि विदेशी मुद्रा की जो बचत हो रही है, वह कुल मिलाकर कितनी प्रभावी सिद्ध हो रही है।

यह भी देखना होगा कि एथनाल नीति खाद्य सुरक्षा के लिए कोई संकट तो पैदा नहीं करने वाली। इसका आकलन भी किया जाना चाहिए कि क्या ई-20 ईंधन पर्यावरण की रक्षा में सहायक बन पा रहा है?