राजकुमार सिंह। प्रति मिनट की कार्यवाही पर करीब ढाई लाख रुपये के खर्च की बर्बादी के पुराने आंकड़े दोहराते हुए संसद की गिरती उत्पादकता पर फिर चिंता जताई जा रही है। मानसून सत्र में मात्र 19 प्रतिशत कामकाज ही हो पाया और 173 कार्य घंटे बर्बाद हो गए। दो महत्वपूर्ण विधेयक मात्र 14 मिनट की चर्चा में पारित कर दिए गए तो 11 बिना किसी चर्चा के। जाहिर है कि संसद में काम कम हुआ और हंगामा ज्यादा तो उसके लिए कोई जिम्मेदार भी होना ही चाहिए। हमारी संसदीय राजनीति में हंगामे के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहराने की परंपरा रही है। बेशक हंगामे की शुरुआत अक्सर विपक्ष की ओर से ही होती है, मगर अकारण तो कुछ भी नहीं होता। किसी भी समस्या का समाधान उसके कारणों के निवारण की मांग करता है, लेकिन हम कारणों से ही मुंह चुरा लेने के अभ्यस्त हो चले हैं। विपक्ष और सत्तापक्ष की भूमिकाएं बदलते ही भाव-भंगिमाएं बदल जाना गैर-जिम्मेदार और अवसरवादी राजनीति ज्यादा है।

2014 से पहले नेता-प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज और अरुण जेटली सदन चलाना सत्तापक्ष की जिम्मेदारी तथा संसदीय गतिरोध को भी संसदीय राजनीति का संवैधानिक उपकरण बताते थे, पर सत्ता पाने के बाद भाजपा का सोच बदल गया। तब संसदीय गतिरोध के लिए भाजपा को कठघरे में खड़ा करने वाली कांग्रेस अब अपनी वैसी ही भूमिका को सर्वथा लोकतांत्रिक ठहरा रही है। संसदीय गतिरोध और उसके जरिये सड़क की राजनीति का एजेंडा तय करने की प्रवृत्ति नई नहीं है, लेकिन उसका लगातार बढ़ते जाना खतरनाक है। पहले जो विरोध वैचारिक या मुद्दा आधारित होता था, अब वह दलगत रंजिश में बदल गया लगता है। इसी कटुता का परिणाम और प्रभाव है कि एक-दूसरे पर टिप्पणी करते हुए भाषाई मर्यादा भी तार-तार की जा रही है।

संसद के मानसून सत्र जैसा हंगामा पहली बार नहीं हुआ। नरसिंह राव के प्रधानमंत्रित्वकाल में हर्षद मेहता कांड पर भी संसद में ऐसे ही दृश्य देखे गए थे। मनमोहन सिंह के समय टू-जी स्पेक्ट्रम और कोयला घोटाले पर संसद कई दिनों तक ठप रही थी। तब कांग्रेस सत्ता में थी और भाजपा विपक्ष में। वह राष्ट्र हित था और यह राष्ट्र विरोध। ऐसा अतार्किक सोच दलों-नेताओं का हो सकता है, जनता का नहीं। इस बार तो हंगामे का संकेत सत्र की शुरुआत के साथ ही मिल गया था। नीट-यूजी पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर काकरोच जनता पार्टी के बैनर तले छात्र एवं युवा जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रहे थे। मानसून सत्र के पहले ही दिन 20 जुलाई को संसद मार्च का एलान भी किया जा चुका था।

सरकार की विलंबित सक्रियता का भी परिणाम रहा कि संसद मार्च के दौरान हिंसा हुई और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बावजूद बाद के घटनाक्रम और उसके चलते हुए राजनीतिक नुकसान से नहीं बचा जा सका। सरकार की उसी नाकामी से विपक्ष के हाथ ऐसा मुद्दा लग गया, जिसने सत्तापक्ष को रक्षात्मक मुद्रा में धकेल दिया। जब उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों के विधानसभा चुनाव चंद महीने ही दूर हैं, तब विपक्ष उस मुद्दे को हाथ से कैसे चले जाने देता, जिसने उसे उस ‘जेन जी’ के हितों का चैंपियन बनने का मौका दे दिया, जो आगामी चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है और जिसका समर्थन हाल तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बड़ी ताकत रही? फिर एक इस्तीफे पर ही न रुक जाने की आक्रामक राजनीति भी विपक्ष ने भाजपा से ही सीखी है। मनमोहन सिंह के दौर में तमाम आरोपों के आधार पर ही भाजपा ने एक के बाद एक मंत्रियों के इस्तीफे करवाए थे। इसलिए धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद विपक्ष के निशाने पर गृह मंत्री अमित शाह और प्रधानमंत्री मोदी को आना ही था।

संसदीय गतिरोध में भी समाधान का रास्ता निकालने की कवायद सदन के सभापति और संसदीय कार्य मंत्री कर सकते हैं, लेकिन विडंबना यह है कि इन दोनों के भी विपक्ष से संबंध सहज नहीं। राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्वकाल में शुरू हुई संसद में ‘हल्ला ब्रिगेड’ की खतरनाक परंपरा तोड़ने की जरूरत किसी ने भी नहीं महसूस की। आज भी सदन में दोनों ही ओर हंगामेबाजों की कमी नहीं, लेकिन यदि संसदीय कार्य मंत्री भी उसी ब्रिगेड का सदस्य बनते दिखें तो विपक्ष से संवाद की पहल कौन करेगा? पिछली लोकसभा में विपक्षी सांसदों के रिकार्ड निलंबन के बाद से स्पीकर ओम बिरला भी विपक्ष का विश्वास लगभग खो चुके हैं। सत्रावसान के बाद उनकी चाय पार्टी का भी विपक्ष ने बहिष्कार किया।

जाहिर है, यह सब संसदीय लोकतंत्र की सुखद तस्वीर पेश नहीं करता, लेकिन क्या आपको किसी के चेहरे पर शिकन भी नजर आती है? नहीं, क्योंकि संसद चलने न चलने से न सत्तापक्ष को फर्क पड़ता है और न ही विपक्ष को। बिना बहस और जवाबतलबी के विधेयक पारित हो जाएं तो सत्तापक्ष के लिए इससे बेहतर स्थिति क्या हो सकती है? दोनों ही सदनों में विपक्ष को भी संसद से बाहर सड़क और चुनाव की राजनीति के लिए अपने मुद्दों को धार देने का मौका मिल ही रहा है। दोनों ही एक-दूसरे को अलोकतांत्रिक बता रहे हैं, पर कौन कितना लोकतांत्रिक है, वह जनता बखूबी जानती है।

दोनों सदनों के लगभग साढ़े सात सौ सांसदों के वेतन-भत्तों और सुख-सुविधाओं पर भी तो करदाताओं की गाढ़ी कमाई ही खर्च होती है। अगर ये सांसद संसदीय कार्यवाही और चर्चा की अपनी प्राथमिक संवैधानिक जिम्मेदारी का निर्वाह ही ठीक से नहीं कर रहे तो आखिर और क्या ही करते होंगे? महिला आरक्षण के नाम पर लोकसभा की सदस्य संख्या 543 से बढ़ाकर 850 करने की कवायद हंगामे के चलते इस सत्र में तो सिरे नहीं चढ़ पाई, पर क्या उससे हमारी संसद ज्यादा जिम्मेदार और जवाबदेह हो जाएगी? आधी आबादी से न्याय की प्रतिबद्धता पर बहस की गुंजाइश नहीं, लेकिन संसद के जनता के प्रति जवाबदेही से विमुख होते जाने से उठने वाले सवालों का जवाब तो मिलना ही चाहिए।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं)