विचार: एकाकी होता जीवन का संध्या काल
परिवार नामक संस्था भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता रही है। उसे बचाने और मजबूत करने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आदि संगठन ‘कुटुंब प्रबोधन’ जैसे अभियान चलाकर इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं।
HighLights
प्रो. रसाल सिंह। यह समाचार सामाजिक चेतना को झकझोरने वाला था कि सोनीपत, हरियाणा के वृद्धाश्रम में रह रहे एक वयोवृद्ध पिता की मृत्यु के बाद उनकी तीनों बेटियों या नाती-नातिनों में से कोई भी उसके अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुआ। बेटियों ने वीडियो काल पर अंतिम संस्कार करना चुना। दिवंगत पिता प्रतिष्ठित व्यापारी थे। उन्होंने अपनी तीनों बेटियों को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाया और उनका विवाह कर पिता होने का दायित्व निर्वाह किया, फिर भी बेटियां न तो उनके अंतिम संस्कार में आईं और न ही तेरहवीं में। पिछले कुछ वर्षों में वृद्ध माता-पिता अपनी संतानों द्वारा अपमानित, उपेक्षित और तिरस्कृत हुए। बुजुर्ग भरा-पूरा परिवार और संसाधन होने के बाद अपने मकानों या वृद्धाश्रमों में एकाकी जीवन जीने को अभिशप्त हैं। यह लगातार स्वार्थी, यांत्रिक और संवेदनहीन होते जा रहे समकालीन समाज के रोबोटीकरण का प्रतिबिंब है।
तीन बेटियों के अंतिम संस्कार में शामिल न होने को केवल अमानवीय कहकर नजरंदाज नहीं किया जा सकता। इसके पीछे कुछ ठोस सामाजिक और आर्थिक कारण काम कर रहे हैं। पहला है-समय की पुनर्परिभाषा। आज के शहरी जीवन में समय को उत्पादकता से जोड़ दिया गया है। हर गतिविधि का मूल्यांकन इस आधार पर होता है कि उससे करियर या आय में कितनी वृद्धि होगी। अंतिम संस्कार इस पैमाने पर खरा नहीं उतरता। उससे कोई स्वार्थसिद्धि या लाभ नहीं होताI इसलिए वह महत्वहीन हो जाता हैI दूसरा कारण है भावनात्मक दूरी। जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक माता-पिता से नहीं मिलता तो उनके प्रति लगाव कम हो जाता है। मृत्यु की जानकारी एक निर्जीव सूचना बनकर रह जाती है, एक आघात नहीं। तीसरा कारण है सामाजिक स्वीकृति में बदलाव।
पहले यदि कोई संतान माता-पिता के अंतिम संस्कार में शामिल नहीं होती थी तो उसे अपराध-बोध और एक किस्म के सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ता था। आज ऐसे व्यवहार को ‘व्यस्त जीवन जनित विवशता’ कहकर सामान्यीकृत सा कर दिया गया है। परंपरागत रूप से भारतीय समाज में बेटियों से यह उम्मीद की जाती है कि वे माता-पिता की अधिक देखभाल करेंगी, पर अब बेटियां भी नौकरी के कारण उसी प्रतिस्पर्धी व्यवस्था का हिस्सा बन जा रही हैं, जिसमें पुरुष पहले से थे। उनका व्यवहार भी बेटों जैसा होता जा रहा है। इसका अर्थ यह नहीं कि बेटियां संवेदनहीन हो गई हैं, बल्कि यह है कि बाजार आधारित आर्थिकी ने स्त्री और पुरुष, दोनों को उत्पादक और उपभोक्ता में अवमूल्यित कर दिया है।
पिछले कुछ दशकों में संयुक्त परिवार टूटे हैं और एकल परिवार का चलन बढ़ा है। शहरीकरण, शिक्षा और रोजगार के अवसरों के कारण लोगों का पलायन/विस्थापन हुआ है। भौगोलिक दूरी का सीधा असर बुजुर्ग माता-पिता पर पड़ा है। उनके पास दो विकल्प बचे हैं-या तो अकेले रहें या वृद्धाश्रम में। दोनों ही स्थितियों में उनकी देखभाल और भावनात्मक जरूरतें पूरी नहीं हो पातीं। अबाध स्वतंत्रता, निजता की चाह और असीम भौतिकता ने भी परिवारों की नींव को हिलाया है। जब पति-पत्नी दोनों नौकरी करते हैं, तो वृद्धाश्रम को एक व्यावहारिक समाधान मानकर बुजुर्गों को निर्वासित कर दिया जाता है। प्रारंभ में महीने में मिलने का वादा होता है। फिर यह अवधि बढ़ती जाती है। फोन पर बात भी औपचारिक होती जाती है। धीरे-धीरे बुजुर्ग बच्चों के जीवन से निष्कासित हो जाते हैं।
राष्ट्रीय वृद्धजन आयोग और कुछ स्वतंत्र संस्थाओं के सर्वेक्षण बताते हैं कि भारत में 15 प्रतिशत से अधिक वरिष्ठ नागरिक अकेले रहते हैं। महानगरों में यह प्रतिशत 25 के आसपास है। वृद्धाश्रमों में रहने वाले 60 प्रतिशत से अधिक लोगों के बच्चे देश के भीतर ही रहते हैं। वृद्धाश्रमों में प्रवेश लेने वाले 40 प्रतिशत बुजुर्ग उच्च और मध्यम वर्ग से हैं। स्पष्ट है इस समस्या का मूल कारण आर्थिक तंगी से ज्यादा आत्मकेंद्रित एवं उपयोगितावादी मूल्यचेतना और पाश्चात्य जीवनशैली है। आज अंतिम संस्कार के लिए ‘लास्ट जर्नी’ जैसी सेवा प्रदाता कंपनियां अस्तित्व में आ चुकी हैं। यदि आज की पीढ़ी अपने माता-पिता के साथ ऐसा व्यवहार कर रही है तो आने वाली पीढ़ी भी कल यही करेगी। यह एक सामाजिक दुष्चक्र है।
परिवार नामक संस्था भारतीय समाज की सबसे बड़ी विशेषता रही है। उसे बचाने और मजबूत करने की आवश्यकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आदि संगठन ‘कुटुंब प्रबोधन’ जैसे अभियान चलाकर इस दिशा में उल्लेखनीय कार्य कर रहे हैं। नीतिगत स्तर पर सरकार को वरिष्ठ नागरिकों और बच्चों के लिए होम हेल्थ केयर, डे केयर सेंटर और सामुदायिक केंद्रों को बढ़ावा देना चाहिए। सरकार ने माता-पिता की देखभाल के लिए 45 दिन की छुट्टियां देने का प्रस्ताव किया है। अन्य कंपनियों और प्रतिष्ठानों को भी कर्मचारियों को ‘चाइल्ड केयर लीव’ और ‘पैरेंट्स केयर लीव’ देने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। उन्हें ऐसा करने पर टैक्स में छूट जैसी सुविधाएं दी जा सकती हैं। व्यक्तिगत स्तर पर भी हमें अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करना होगा। हमें नई पीढ़ी को बुजुर्गों के प्रति सम्मान और जिम्मेदारी का भाव सिखाना होगा।
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के किरोड़ीमल कालेज में प्रोफेसर हैं)









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