सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने एक बार फिर अपने विभाग की कमियों को बेबाकी से स्वीकार किया। उन्होंने न केवल यह माना कि राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण में अफसरों और ठेकेदारों की मिलीभगत से तकनीकी एवं वित्तीय योग्यता तय हो रही है, बल्कि यह कहने में भी संकोच नहीं किया कि ठेकेदार सरकारी नियमों का बेजा लाभ उठाने में सफल हैं। ऐसी खरी बातें वे पहले भी कर चुके हैं, लेकिन लगता है उन्हें इसका भान नहीं कि इन खामियों-खराबियों को दूर करने की जिम्मेदारी तो उन्हीं की है।

उन्हें सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री पद पर आसीन रहते हुए 12 वर्ष से अधिक का समय हो गया है। यह एक रिकार्ड है। आखिर इतने लंबे अनुभव के बाद भी वे अपने मंत्रालय की कमजोरियों की केवल पहचान ही क्यों कर पा रहे हैं? क्या इन कमजोरियों को दूर करने का काम प्राथमिकता के आधार पर नहीं होना चाहिए? वे इससे अनजान नहीं हो सकते कि बढ़ती मार्ग दुर्घटनाएं और उनमें होने वाली मौतों के कारण उनका मंत्रालय सवालों के घेरे में है।

नितिन गडकरी के इस कथन से संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि गलत विस्तृत परियोजना रिपोर्ट यानी डीपीआर तैयार करने वाले सलाहकार राजमार्गों पर होने वाली दुर्घटनाओं के लिए दोषी हैं, क्योंकि ऐसा काम करने वालों को दंडित करने का काम उनके ही मंत्रालय को करना है। यहां प्रश्न यह भी है कि ऐसे अक्षम सलाहकारों की सेवाएं ली ही क्यों जा रही हैं? इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है।

समस्या केवल राजमार्गों पर बढ़ते सड़क हादसों की ही नहीं है। समस्या यह भी है कि आम तौर पर राजमार्ग गुणवत्ता के मानकों पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं। स्थिति यह है कि एक्सप्रेसवे तक उद्घाटन के चंद माह बाद ही धंस जा रहे हैं। इससे इन्कार नहीं कि देश में बड़े पैमाने पर सड़क, पुल आदि बन रहे हैं, लेकिन यह प्रश्न अनुत्तरित है कि उनकी गुणवत्ता दोयम दर्जे की क्यों साबित हो रही है? सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री ने निर्माण की गुणवत्ता से समझौता करने वाले ठेकेदारों को काली सूची में डालने की चेतावनी भले ही दी हो, लेकिन सच यह है कि वह असर करती नहीं दिख रही है।

कहीं इसका कारण यह तो नहीं कि ऐसे ठेकेदार अपनी कंपनियों के नाम बदलकर फिर से सरकारी ठेके हासिल कर ले रहे हैं? नितिन गडकरी ने उप-ठेकेदारी के नियम बदलने के जो संकेत दिए, वे पर्याप्त नहीं कहे जा सकते, क्योंकि यह काम अब तक हो जाना चाहिए था। आखिर 12 साल एक लंबा कालखंड होता है। यह सही है कि सुधारों का सिलसिला सदैव कायम ही रहता है, लेकिन जो सुधार बहुत पहले हो जाने चाहिए थे, उनका भी लंबित रहना अफसोस और चिंता की बात है।