जयसिंह रावत। हिमालय की दुर्गमता को वरदान में बदलने के लिए उसका सीना छलनी कर सड़कें, रेल लाइनें, बिजलीघर और सुरंगें बनाई जा रही हैं। यह सब आवश्यक ही लगता है, लेकिन जब हम प्रकृति के साथ अंधाधुंध छेड़छाड़ के तात्कालिक और दूरगामी परिणामों की कल्पना करते हैं तो सिहरन होती है। 2023 में 17 दिनों तक दुनिया की सांसें रोकने वाले सिलक्यारा सुरंग हादसे वाली जगह पर इसी साल फिर कंक्रीट गिरने से एक मजदूर की मौत हो गई।

इस हादसे पर बहस चल ही रही थी कि 20 जुलाई को सिक्किम के तीस्ता स्टेज-6 परियोजना की सुरंग में मीथेन गैस के विस्फोट और सुरंग का एक हिस्सा ढहने से 25 मजदूरों की मौत हो गई। इस भयंकर हादसे की गूंज अभी थमी भी नहीं थी कि उत्तराखंड के चमोली जिले में विष्णुगाड-पीपलकोटी जलविद्युत परियोजना की सुरंग में फिर बड़ा हादसा हो गया, जिसमें आठ श्रमिकों की मौत हो गई। इस हादसे का तात्कालिक कारण अचानक सुरंग के एक हिस्से का ढहना तथा उससे निकले मलबायुक्त पानी का सैलाब था।

हिमालयी क्षेत्र में सिलसिलेवार हादसे मानव जीवन के प्रति प्रशासनिक और निर्माण एजेंसियों की उपेक्षा की ओर इशारा तो करते ही हैं, साथ ही हिमालय के भूगर्भ की अनदेखी और पर्वतों में सुरंग इंजीनियरिंग की कामयाबी पर भी प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं। ताजा हादसा किसी एक परियोजना या निर्माण स्थल की विफलता भर नहीं है। इसके पीछे संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र में तेजी से हो रहे अवसंरचनात्मक निर्माणों और वहां की जटिल भूगर्भीय परिस्थितियों के बीच बढ़ता तनाव दिखाई देता है।

सवाल यह है कि क्या हम हिमालय की प्रकृति को समझकर सुरंग बना रहे हैं या केवल अपनी विकास योजनाओं की समयसीमा पूरी करने के लिए पहाड़ को उसकी मूल संरचना के विरुद्ध धकेल रहे हैं? बार-बार हादसों का दोहराया जाना साबित करता है कि हमने अतीत से कोई सबक नहीं सीखा। किसी भी निर्माण स्थल पर होने वाली छोटी विफलताएं दरअसल भविष्य के बड़े हादसों की पूर्व चेतावनियां होती हैं। यदि इन चेतावनियों को सुरक्षा व्यवस्था सुधारने का अवसर न बनाया जाए, तो दुर्घटनाएं केवल समय का इंतजार करती हैं।

भूगर्भ विज्ञान के दृष्टिकोण से हिमालय में सुरंग का निर्माण कोई साधारण मैदानी इंजीनियरिंग का काम नहीं है। हिमालय दुनिया की सबसे युवा पर्वत प्रणालियों में से एक है और भूगर्भीय रूप से आज भी निरंतर गतिमान है। यहां की चट्टानें अनेक स्थानों पर टूटी-फूटी और दरारों से भरी हैं। क्या विष्णुगाड-पीपलकोटी परियोजना की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट बनाने वालों को यह प्राथमिक ज्ञान नहीं था कि हिमालय पर बर्फ के रूप में जो पानी जमा है, वह रिस-रिसकर पहाड़ के भीतर एक संपूर्ण और विशाल भूजलतंत्र बनाता है?

कुछ वर्ष पहले इसी क्षेत्र में स्थित तपोवन-विष्णुगाड जलविद्युत परियोजना की सुरंग में हुआ भारी जल-स्राव भी गंभीर चिंता का कारण बना था। ऐसा भूगर्भिक जल-स्राव एक अप्रत्याशित खतरा भर नहीं, बल्कि यह क्षेत्र के पर्यावरण और पारिस्थितिकी तंत्र को पहुंचाया जाने वाला एक बड़ा स्थायी नुकसान है।

जब सुरंगों के कारण सदियों पुराना आंतरिक भूजलतंत्र छिन्न-भिन्न हो जाता है, तो बहुत बड़े भूभाग को गंभीर जल-संकट से जूझना पड़ता है। पीपलकोटी हादसे की मानवीय-आर्थिक क्षतियों का आकलन तो होगा ही, पर दूरगामी पर्यावरणीय क्षति की भरपाई कोई नहीं कर पाएगा। पहाड़ के ऊपर दिखाई देने वाली जमीन और उसके भीतर की भूगर्भीय संरचना को एक जैसा समझना आधुनिक इंजीनियरिंग की भूल है। सुरंग के सामने दिखाई देने वाली चट्टान कुछ मीटर आगे वैसी नहीं रहती।

भूमिगत जल अपना रास्ता बदल सकता है और चट्टान की मजबूती अचानक कम हो सकती है। सुरंग का नक्शा केवल निर्माण शुरू होने से पहले तैयार नहीं होता, बल्कि खोदाई के दौरान सामने आने वाली वास्तविक भूगर्भीय परिस्थितियों के अनुसार उसमें लगातार बदलाव करना पड़ता है। सुरंग निर्माण में कमजोर चट्टान मिलने पर केवल कंक्रीट की परत चढ़ा देना पर्याप्त नहीं। खतरे का संकेत मिलने पर काम रोकना किसी परियोजना की विफलता नहीं, बल्कि कुशल इंजीनियरिंग का प्रमाण है।

दुर्भाग्य से हमारे देश में परियोजनाओं को समय पर पूरा करने, लागत सीमित रखने की होड़ मची रहती है, लेकिन पहाड़ किसी समयसीमा से संचालित नहीं होते और न ही प्राकृतिक चट्टानें किसी ठेके की शर्तों से बदलती हैं। इसलिए हिमालयी सुरंगों के लिए सुरक्षा आडिट की एक स्वतंत्र और कठोर व्यवस्था जरूरी है। दुर्घटना के बाद जांच कराने से ज्यादा जरूरी है कि निर्माण के दौरान नियमित रूप से बाहरी भूगर्भ विशेषज्ञों से निष्पक्ष जांच कराई जाए। सिलक्यारा के अनुभव बताते हैं कि बचाव अभियानों में तकनीक तो बढ़ी है, लेकिन किसी देश की श्रेष्ठता हादसे न होने देने में है।

हिमालय हमें बार-बार चेतावनी दे रहा है। सवाल यह नहीं कि अगली दुर्घटना कब होगी, बल्कि यह है कि हम अपनी नीति और व्यवस्था कब बदलेंगे? किसी सुरंग के उद्घाटन पर रोशनी जलती है और विकास का उत्सव मनाया जाता है, लेकिन उस रोशनी के पीछे मजदूरों की अनकही कुर्बानियां छिपी होती हैं। यदि वही अंधेरा बार-बार उनकी कब्र बनता रहे, तो हमें विकास की इस पूरी परिभाषा पर पुनर्विचार करना होगा।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)