संजय कुमार झा। फरक्का जल संधि के पिछले तीन दशकों के अनुभव और आंकड़े ठोस प्रमाण हैं कि बिहार को इससे बाढ़ और सुखाड़ की दोहरी मार झेलनी पड़ी है। सितंबर 1996 में तत्कालीन संयुक्त मोर्चा सरकार के विदेश मंत्री इंद्र कुमार गुजराल (जो बाद में प्रधानमंत्री बने) द्वारा प्रतिपादित 'गुजराल डाक्ट्रिन' का मूल मंत्र था कि भारत को बड़ा दिल दिखाते हुए पड़ोसी देशों के साथ संबंधों में 'एकतरफा रियायत' देनी चाहिए। विडंबना यह रही कि इस नीति के तहत दिसंबर 1996 में बांग्लादेश को जल-अधिकार सौंपते वक्त जब बिहार के हितों की बलि चढ़ाई जा रही थी, तब मुख्यमंत्री लालू यादव मौन साधे रहे, जो संयुक्त मोर्चा के एक प्रभावी नेता थे।

केंद्र सरकार को बाहर से समर्थन दे रही कांग्रेस के तत्कालीन राष्ट्रीय अध्यक्ष सीताराम केसरी भी मूल रूप से बिहार के ही थे। यदि उसी समय संधि का विरोध हुआ होता, तो बिहार को बीते तीन दशकों में हुआ भारी नुकसान नहीं झेलना पड़ता। अब जबकि फरक्का जल संधि की 30 वर्षों की समयसीमा दिसंबर 2026 में समाप्त होने जा रही है, तब यह प्रश्न केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि व्यापक जनहित और जल-सुरक्षा के साथ-साथ राष्ट्रहित से जुड़ा महत्वपूर्ण प्रश्न बन जाता है।

गंगा बिहार के लिए केवल एक पवित्र नदी ही नहीं, अपितु करोड़ों लोगों की जीवनरेखा है। पेयजल, सिंचाई और उद्योग-धंधों के लिए पानी की उपलब्धता के साथ-साथ पर्यावरण संतुलन तक गंगा के प्रवाह से जुड़ा है। बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शुरू से कहते रहे हैं कि फरक्का बराज के कारण गंगा की अविरलता बाधित हुई। नदी में गाद की भरमार बढ़ी है। जल संसाधन मंत्री रहते हुए मैंने भी फरक्का बराज की संरचना और जल संधि के प्रविधानों पर पुनर्विचार का केंद्र सरकार से अनुरोध किया था।

संधि के प्रविधानों के अनुसार फरक्का बराज पर शुष्क मौसम (लीन पीरियड) में 1500 क्यूमेक जलस्राव सुनिश्चित किया जाना है, जबकि इसे पूरा करने के लिए बिहार को बक्सर में औसतन मात्र 400 क्यूमेक जलस्राव ही उपलब्ध हो पाता है। यानी निर्धारित जलस्राव का 73 प्रतिशत बोझ बिहार को वहन करना पड़ता है, जबकि गंगा का 75 प्रतिशत जलग्रहण क्षेत्र बिहार के अपस्ट्रीम राज्यों में है। इससे बिहार के उस नैसर्गिक अधिकार का हनन होता है, जो उसे गंगा और उसकी सहायक नदियों के जल उपयोग पर मिलना चाहिए।

फरक्का बराज के निर्माण का उद्देश्य कोलकाता बंदरगाह और हुगली नदी में जल-प्रवाह बनाए रखना था। 1975 में बराज चालू होने के बाद गंगा की अविरलता बाधित हुई और अपस्ट्रीम में गाद की समस्या शुरू हो गई। आज बिहार में गंगा की लगभग पूरी 445 किमी लंबाई में अतिरिक्त गाद जमा है, जिससे नदी उथली होकर अपना मार्ग बदल रही है। मानसूनी वर्षा का जो पानी पहले गंगा की तलहटी में समा जाता था, अब आसपास के गांवों में बाढ़ लाता है। राज्य सरकार वर्षों से इस विषय पर केंद्र का ध्यान आकृष्ट कराती रही है, लेकिन राष्ट्रीय गाद प्रबंधन नीति जैसी ठोस पहल अभी अमल में नहीं आ सकी है। इससे बिहार को जहां मानसून में बाढ़ की तबाही झेलनी पड़ती है, वहीं शुष्क मौसम में राज्य पानी की भारी किल्लत से भी जूझता है।

हर साल सुखाड़ से प्रभावित होने वाले दक्षिण बिहार के जिलों में ही नहीं, बाढ़ से सर्वाधिक प्रभावित मिथिला के दरभंगा और मधुबनी जैसे जिलों में भी भूजल स्तर तेजी से गिर रहा है, सिंचाई प्रभावित हो रही है और पेयजल संकट गहरा रहा है। राज्य के जलाशयों की जल-संचयन क्षमता के विरुद्ध पिछले पांच वर्षों में औसतन मात्र 35 प्रतिशत जल-संचयन हो सका है, जो स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। गंगा का प्रवाह बाधित होने और गाद भरने से बिहार के जलीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान पहुंचा है। इससे राष्ट्रीय जलीय जीव 'गांगेय डाल्फिन' और स्थानीय मछलियों की कई प्रजातियों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है। गंगा बेसिन के कई जिलों में आर्सेनिक और फ्लोराइड जैसे जहरीले रसायनों का असर भी खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है। गंगा नदी का बेसिन भारत का सबसे बड़ा नदी बेसिन है, जो देश के लगभग 26 प्रतिशत भू-भाग को कवर करता है और देश की करीब 43 प्रतिशत से अधिक आबादी की पानी, कृषि और आजीविका की जरूरतों को पूरा करता है।

1996 में अविभाजित बिहार की आबादी करीब 9.3 करोड़ थी, जिसमें वर्तमान बिहार की आबादी करीब 7.3 करोड़ थी। 2026 में यह आंकड़ा 13 करोड़ के पार पहुंच चुका है। तीन दशकों में आबादी में 5.5 से छह करोड़ की वृद्धि के साथ पानी की मांग भी तेजी से बढ़ी है। बिहार सरकार ने वर्ष 2050 तक की भावी जल आवश्यकताओं का वैज्ञानिक आकलन कर केंद्र सरकार द्वारा गठित समिति के समक्ष कुल 2,000 क्यूसेक अतिरिक्त जल की मांग रखी थी, लेकिन समिति के अंतिम प्रतिवेदन में बिहार की पेयजल और औद्योगिक जरूरतों के लिए मात्र 900 क्यूसेक जल का ही प्रविधान किया गया। आधी से भी कम मांग स्वीकार किए जाने से आने वाले दशकों में बिहार की सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक विकास से जुड़ी योजनाएं प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई है।

फरक्का बराज और फरक्का जल संधि की अपनी जगह उपयोगिताएं हो सकती हैं, लेकिन इनके लिए गंगा बेसिन पर निर्भर राज्यों, खासकर बिहार के व्यापक हितों की अनदेखी अब और नहीं की जा सकती। गंगा और उसकी सहायक नदियों के जल के पर्याप्त उपयोग का अधिकार बिहार को नहीं मिला, तो राज्य के दीर्घकालिक विकास और करोड़ों बिहारवासियों की आजीविका पर संकट मंडरा सकता है। जब तक गंगा के पानी पर गंगा बेसिन के राज्यों का हिस्सा वैज्ञानिक आधार पर तय नहीं हो जाता, तब तक बिहार को अपनी घरेलू एवं विकास संबंधी आवश्यकताओं के लिए गंगा से निर्बाध जल निकासी का अधिकार मिलना चाहिए। पिछले 30 वर्षों से हो रही अन्यायपूर्ण अनदेखी को समाप्त करना समय की जरूरत है। बिहार सहित गंगा बेसिन पर निर्भर सभी राज्यों की 2050 तक की जल आवश्यकताओं का वैज्ञानिक आकलन कर एक नई व्यवस्था लागू की जाए।

(लेखक जदयू के कार्यकारी राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं राज्यसभा सदस्य हैं)