विचार: भीड़तंत्र का पर्याय न बने लोकतंत्र
राष्ट्रीय राजनीति में जनता पार्टी से लेकर असम में आसू और आम आदमी पार्टी के उदाहरणों में देखा गया कि छात्र-युवा अंततः पेशेवर नेताओं द्वारा ही मुख्य रूप से इस्तेमाल होते हैं।
HighLights
युवा आंदोलन राजनीतिक दलों के स्वार्थ के लिए इस्तेमाल होते हैं।
भीड़तंत्र केवल सत्ता बदलता है, नीतिगत सुधार नहीं लाता।
लोकतंत्र में विवेकशील नेतृत्व ही सकारात्मक परिणाम देता है।
शंकर शरण। दिल्ली के जंतर-मंतर पर 'कॉकरोच' छात्र-युवाओं के धरने पर जिन दलों, नेताओं, बड़े लोगों ने खुल कर या चुपचाप समर्थन-सहयोग दिया था, वे रांची के मुंडा स्टेडियम में नदारद रहे। अथवा कहें कि एक जगह पीठ पर एक तरह के दल थे, तो दूसरी जगह दूसरे खेमे के। जबकि दोनों स्थानों पर मुद्दा शैक्षिक परीक्षाओं में गड़बड़ी के विरुद्ध था। यह तुलनात्मक दृश्य क्या दिखाता है?
यही कि युवा शक्ति अथवा आज के मुहावरे में 'जेन-जी' के बारे में एकतरफा बातों को विवेक पर तौलना बेहतर है। हर युग में युवाओं में अधिक ऊर्जा, आदर्श और न्यायप्रियता रहती है। इसलिए कभी-कभी बार-बार होती गड़बड़ी या अनुचित परिघटना पर उनमें उद्वेलन 'युवा आंदोलन' का रूप लेता है। प्रायः ऐसा तभी होता है, जब स्थापित राजनीतिक दल में अच्छे नेताओं का अभाव हो। तब कोई घटना अनायास किन्हीं युवाओं को परिदृश्य में ला देती है।
जैसा हाल में मुख्य न्यायाधीश द्वारा एक विशेष संदर्भ में 'काकरोच' कह देने से हुआ। यदि देश के कोई नेता वैसी संज्ञा का प्रतिवाद करते, तो संभवतः काकरोच जनता पार्टी जैसी व्यंग्यात्मक प्रतिक्रिया को वैसा अप्रत्याशित समर्थन नहीं मिलता। इस तरह देखा जाए तो काकरोच आंदोलन का उद्भव हमारे राजनीतिक दलों की सामूहिक उदासीनता का भी परिणाम था।
राष्ट्रीय राजनीति में जनता पार्टी से लेकर असम में आसू और आम आदमी पार्टी के उदाहरणों में देखा गया कि छात्र-युवा अंततः पेशेवर नेताओं द्वारा ही मुख्य रूप से इस्तेमाल होते हैं। काम निकल जाने और सत्ता पा लेने के बाद नेता बड़े-बड़े बौद्धिकों, विधिवेत्ताओं आदि को दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल फेंक देते हैं। इसलिए राजनीति में दूरदृष्टि, दृढ़ता और विवेकशीलता का स्थायी महत्व है।
किसी भी आंदोलन में यदि प्रभावी नेता विवेकशील न हों तो उसके गलत दिशा में जाने की भरी-पूरी आशंका रहती है। हालांकि दृढ़ता, समर्पण, संसाधन-कुशलता आदि गुण किसी मतांध, कट्टरपंथी में भी हो सकते हैं। अतः भीड़ देखकर उत्साहित होने में सावधानी रखनी चाहिए, क्योंकि वह विचारहीन होती है।
उसे सदैव कोई और इस्तेमाल करता है। एक बार भीड़ में कोई उलटी-सीधी बात भर दी जाए तो वह अपने बीच के व्यक्तियों को भी नियंत्रण में ले लेती है। यह अधिकांश भीड़ आंदोलनों में देखा गया है। जेपी आंदोलन से लेकर काकरोच पार्टी के संसद मार्च तक यही हुआ है।
कुल मिलाकर मामला न सीधा है और न एकतरफा। यही राजनीति की जटिलता है। इसमें जितना सामने रहता है, उससे अधिक छिपा रहता है। उन छिपी बातों, उद्देश्यों में अधिकांश अनुपयुक्त होती हैं। इसीलिए छिपाई जाती हैं, लेकिन भोले छात्र युवा ही नहीं, आम लोग भी उससे अनजान रहते हैं। इसीलिए लोकतंत्र में विशेषतः लोगों को लुभाने, भड़काने, बड़ी-बड़ी बातें करने, सपने दिखाने का प्रचलन है। किसी भी तरह अधिक लोगों को अपनी ओर खींचना ही आम नेताओं का उद्देश्य होता है। यह काम भीड़ की मानसिकता को उकसा कर अधिक सरलता से होता है।
इसीलिए नेताओं की बिरादरी भीड़ की चापलूसी करती है। बात-बात में 'जनता' का गुणगान उसका सबसे सामान्य रूप है। जबकि कहीं भी जनता कोई नीति नहीं बनाती। उसके नाम पर अच्छे या बुरे नेता ही यह करते हैं। यह अकाट्य तथ्य है कि कोई भी भीड़ प्रेरित आंदोलन अपने घोषित आदर्श वाला लक्ष्य नहीं प्राप्त करता। उसके बल से केवल सत्ता में उलटफेर होता है।
नई सत्ता अच्छी नीति बनाए या पहले से भी बुरा हाल कर दे, यह मात्र नए नेताओं के विवेक और योग्यता पर निर्भर रहता है। यह रुझान पचास वर्षों के भारतीय अनुभव से प्रमाणित है। जेपी का छात्र आंदोलन और आल असम छात्र यूनियन आदि ने अंततः सत्ता में उलटफेर तो किया, किंतु उनके घोषित लक्ष्य 'भ्रष्टाचार का खात्मा' या 'विदेशी घुसपैठ रोकना' आकाश-कुसुम ही रहे। इतना ही नहीं, स्थिति पहले से और बुरी होती गई।
केवल भीड़, नारे और आवेश से आशा रखना फिजूल है। राजनीति में शार्टकट से कोई नीतिगत उपलब्धि असंभव है। नेताओं, दलों के बदले मुद्दों पर शांतिपूर्वक विचार करने पर ही वैसी उपलब्धि का मार्ग मिल सकता है। हालांकि वह धैर्य और सामाजिक चेतना की मांग करता है, जबकि पेशेवर नेता अपनी दलीय चेतना से लाभ की फिराक में रहते हैं। अतः आकस्मिक आंदोलनों में भी वे खुले-छिपे मौका तलाशते हैं कि उसका अपने स्वार्थ में उपयोग करें। यही कारण है कि बड़े-बड़े आंदोलन भी अपना घोषित लक्ष्य पाने में विफल रहते हैं।
उसकी शुरुआत किसी उचित समस्या से तो होती है, परंतु उसका वैज्ञानिक समाधान केवल सामाजिक भावना से मिल सकता है, जबकि दलीय प्रतिद्वंद्विता उसे अनिवार्यतः इधर या उधर खींचती है। तदनुरूप समस्या पर समुचित विचार और सही समाधान पर सहमति बनाने के बदले दलीय धड़ों द्वारा एक-दूसरे को गिराने की प्रवृत्ति ऊपर हो जाती है। लोगों को लफ्फाजी से आसान रास्ता दिखाया जाता है।
इस तरह सत्ता परिवर्तन तो हो जाता है, लेकिन समस्या यथावत बनी रहती है। किसी भी आंदोलन में नारों से शायद ही कुछ तय होता है। उलटे भीड़ को शक्ति देना, उसके समक्ष झुकना एक तरह से बड़े संकट को न्योता देने जैसा हो सकता है। जनता के नाम पर मुट्ठी भर शातिर लोग आम लोगों का इस्तेमाल करते हैं।
किसी भी आंदोलन की सरसरी चापलूसी या आदतन भर्त्सना अनुपयुक्त है। राजनीति में सब कुछ निर्णयकारी व्यक्तियों पर निर्भर होता है। यदि निर्णायक स्थान पर विवेकशील और कटिबद्ध व्यक्ति हों तभी सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। अन्यथा तमाम हंगामे और उथल-पुथल के बाद भी हालात वही ढाक के तीन पात वाले रहते हैं। यही राजनीति के प्रति सदियों से महान ज्ञानियों की सीख है।
यही दुनिया भर के आधुनिक अनुभव भी हैं। इसलिए हमें भीड़तंत्र और लोकतंत्र की बारीक रेखा का सदैव ध्यान रखना होगा। राष्ट्रजीवन के किसी भी अन्य क्षेत्र की तुलना में लोकहित की राजनीति कहीं अधिक पात्रता एवं विशेषज्ञता की मांग करती है। इसकी जितनी उपेक्षा होती है, उस हद तक समाज की हानि होती रहती है।
(लेखक राजनीतिशास्त्र के प्राध्यापक एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं)









-1787075636638_v.webp)

-1787075479568_v.webp)