विचार: लोकलुभावनवाद से त्रस्त राजनीति
कल्याणकारी व्यय सामाजिक एवं नैतिक अनिवार्यता है, लेकिन सुशासन के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और कानून एवं व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता होती है।
HighLights
भारतीय राजनीति में लोकलुभावनवाद का बढ़ता प्रभाव।
आर्थिक विकास हेतु उत्पादन-केंद्रित कल्याण नीति आवश्यक।
सामाजिक न्याय और समाजवाद में अंतर समझना महत्वपूर्ण।
तरुण गुप्त। अमेरिका और ईरान के बीच अस्थिर संघर्षविराम के स्थिर होने की आशा और घरेलू मोर्चे पर महिला आरक्षण संबंधी विधेयक के गिरने से उपजी निराशा के बीच अब ध्यान पूरी तरह घरेलू राजनीति पर केंद्रित है, जो किसी वैश्विक टकराव की तुलना में हमारे कहीं अधिक नियंत्रण में है। इस साल देश के कई राज्यों में चुनाव हैं। हालांकि इसमें कोई हैरानी नहीं कि आखिर कौन से साल चुनावों का क्रम नहीं चलता। अभी तक असम, केरलम और पुडुचेरी में चुनाव हो चुके हैं। बंगाल और तमिलनाडु के चुनाव भी इसी महीने निपट जाएंगे।
अगले वर्ष की शुरुआत में पंजाब और उत्तराखंड के अलावा राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश में चुनाव होने हैं। जहां इन चुनावों में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआइआर का मुद्दा चर्चा में रहा है, वहीं हमेशा की तरह धर्म, जाति, क्षेत्रीय अस्मिता और लोकलुभावनवाद आदि के माध्यम से वोट बटोरने की होड़ भी राजनीतिक दलों में जारी है। क्षेत्रवाद एवं रेवड़ियों की इस राजनीति का दुष्परिणाम स्वाभाविक रूप से हमारे सामाजिक तानेबाने और अर्थव्यवस्था को भुगतना पड़ता है।
आर्थिक प्रबंधन की कसौटी प्राय: शासनकला की मूलभूत एवं सर्वाधिक महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है। भारत में केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों का कुल वार्षिक व्यय लगभग 90 लाख करोड़ रुपये के आसपास है। यदि केंद्र से वित्तीय हस्तांतरण को देखा जाए तो राज्य सरकार और स्थानीय निकाय मिलकर करीब 60 लाख करोड़ रुपये खर्च करते हैं। स्थानीय निकायों पर सीधा नियंत्रण राज्य सरकारों का होता है। यानी व्यय के मोर्चे पर बड़ी जिम्मेदारी मुख्यत: राज्य सरकारों और उनके विवेक पर ही निर्भर है। यदि समस्त सरकारी व्यय की बात करें तो लगभग आठ लाख करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि मुफ्त राशन, नकदी हस्तांतरण, कृषि कर्ज माफी और कृषि सब्सिडी जैसी राजनीतिक रेवड़ियों पर ही खर्च होती है। इसमें शिक्षा-स्वास्थ्य पर होने वाला व्यय शामिल नहीं है।
क्या रेवड़ियों पर होने वाला यह खर्च कुल व्यय के अनुपात में बहुत अधिक या असंतुलित है? यदि विकसित देशों की व्यवस्था से परखें तो उत्तर होगा ‘नहीं’? विकसित देशों में मुफ्त सौगातों की अपनी एक विशेष सूची है। उसे भले ही सामाजिक सुरक्षा का नाम मिला हो, पर यह संकल्पना उनके लिए अपरिचित तो कतई नहीं। फिर भी, इसमें एक मूलभूत अंतर यह है कि विकसित देशों में ऐसे खर्च जहां पूरी तरह संस्थागत स्वरूप में सामाजिक अनुबंध का हिस्सा होते हैं, वहीं भारत में ये खर्चे मनमानेपन का उदाहरण हैं, जिसके लिए चुनावी दबाव से उपजा प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद ही अधिक जिम्मेदार है। इस खर्च की प्रकृति एवं स्वरूप भी भिन्नता लिए होता है। भारत में यदि कृषि कर्ज माफी से तुलना करें तो अमेरिका में उसके लिए रियायती फसल बीमा और न्यून ब्याज पर कर्ज की सुविधा जैसी मिसालें हैं।
भारत जैसी आर्थिकी के लिहाज से ब्राजील का उदाहरण लें तो वहां सशर्त नकदी हस्तांतरण की व्यवस्था है, जिसमें विद्यालयों में उपस्थिति एवं टीकाकरण जैसे मानक जुड़े हैं। इन सभी लोकलुभावन योजनाओं का वित्तपोषण करदाताओं की जेब से होता है, लेकिन विदेश में इसके लिए सुदृढ़ व्यवस्था है। विकसित देशों में ऐसी योजनाएं जोखिम प्रबंधन एवं सामाजिक समझौतों के रूप में प्रस्तुत की जाती हैं। उनका वितरण तंत्र भी बेहतर परिणाम लिए होता है। कल्याणकारी राज्य की अवधारणा भी कोई नई या अनूठी नहीं है। हमारे लिए यही विचारणीय होना चाहिए कि हम अपनी कल्याणकारी राज्य व्यवस्था को अवसर प्रदान करने वाले राज्य के रूप में रूपांतरित करने के लिए पर्याप्त प्रयास कर पा रहे हैं या नहीं?
भारत को 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य की पूर्ति का गणित एकदम सरल है। इसके लिए हमें दो दशकों तक कम से कम आठ प्रतिशत की दर से आर्थिक वृद्धि करनी होगी। हमें उत्पादन केंद्रित कल्याणकारी संकल्पना अपनानी होगी, जहां राजकोषीय प्राथमिकताएं उपभोग आधारित सब्सिडी के बजाय क्षमता निर्माण से संबंधित निवेश की ओर उन्मुख हों। अनुमानों के अनुसार बुनियादी ढांचे और मानव विकास पर व्यय प्रत्येक रुपया जीडीपी में 2.5 से लेकर चार रुपये तक का गुणक प्रभाव रखता है, वहीं मुफ्त वितरण वाली योजनाओं में एक रुपया महज 0.9 रुपये के हिसाब से ही उत्पादकता प्रदान करता है।
कल्याणकारी व्यय सामाजिक एवं नैतिक अनिवार्यता है, लेकिन सुशासन के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और कानून एवं व्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता होती है। क्या हमारे यहां चुनाव इन मुद्दों पर लड़े जा रहे हैं और उससे भी महत्वपूर्ण यह कि क्या हमारे मतदाता इन मुद्दों को प्राथमिकता दे रहे हैं? चुनावों में वंचितों की राजनीति, क्षेत्रीय उप-राष्ट्रवाद एवं अस्मिताओं और लोकलुभावनवाद का बोलबाला आखिर कब तक कायम रहेगा? वंचितों की सहायता आवश्यक है, कितु इस क्रम में अंतिम लक्ष्य यही हो कि सहायता की निर्भरता चरणबद्ध रूप से घटती जाए। आत्मनिर्भरता न केवल राष्ट्रीय, अपितु निजी स्तर पर भी उतनी ही अपेक्षित एवं आवश्यक है। भूखे को पका हुआ भोजन देने के बजाय भोजन पकाने की विधि सिखाना कहीं अधिक उपयोगी है।
हमारे नीति निर्माता विभिन्न मुद्दों पर असहमत हो सकते हैं, पर अर्थशास्त्र के मूल सिद्धांतों पर कोई राष्ट्रीय सहमति तो बनानी ही होगी। देशवासियों को भी चुनावी राजनीति को विकास-केंद्रित बनाने में योगदान देना होगा। वर्षों से चली आ रही असमानता दूर करना उत्कृष्ट विचार है। समानता संवैधानिक सिद्धांत भी है, किंतु आखिर हमारा लक्ष्य क्या होना चाहिए-समान आय या समान अवसर? हम गलती से सामाजिक न्याय और समाजवाद में घालमेल कर देते हैं। एक उदात्त विचार के रूप में सामाजिक न्याय को सुनिश्चित किया जाना जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है समाजवाद को खारिज करना। समावेशी विकास हमारा लक्ष्य अवश्य है, पर वहां तक पहुंचने का मार्ग एक विफल माडल नहीं हो सकता। यह विस्मृत न किया जाए कि जहां पूंजीवाद उत्पादन एवं सृजन करता है, वहीं समाजवाद केवल अनुत्पादकता को बढ़ावा देता है।
(लेखक दैनिक जागरण के प्रबंध संपादक हैं)










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