विचार: विश्व में शांति बनाए रखने की चुनौती
मानव इतिहास की यह कैसी विडंबना है कि विश्व में शिक्षा और साक्षरता का सराहनीय प्रसार हुआ है, मनुष्य की मानवीय प्रवृत्तियों की समझ भी बढ़ी है।
HighLights
ट्रंप की आक्रामक नीतियों से वैश्विक शांति को खतरा।
संयुक्त राष्ट्र शांति स्थापित करने में निष्क्रिय साबित हुआ।
भारत को विश्व शांति के लिए दीर्घकालीन रणनीति बनानी होगी।
जगमोहन सिंह राजपूत। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इतिहासकारों का कार्य सरल कर दिया है। वे खुद को महान शांतिदूत बताते हैं। फिर भी, अपने युद्ध मंत्री की इच्छापूर्ति के लिए ईरान पर आक्रमण कर दिया। हमले के बाद से वे लगभग प्रतिदिन विजय की घोषणा करते आ रहे हैं। वे कहते हैं कि अमेरिकी सुरक्षा के लिए कनाडा एवं ग्रीनलैंड पर भी आधिपत्य आवश्यक है। उन्होंने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को सपत्नीक उठवा लिया है। क्यूबा उनकी जकड़न में पहले से ही है। वे भारत पर भी इन दिनों अपनी मनमानी चलाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी बातों को कोई मानता है या नहीं, उनकी प्रतिष्ठा एवं उनके देश की साख पर इसका कैसा असर होता है, इस सब पर वे ध्यान नहीं देते। उनके लिए इस तथ्य का भी कोई महत्व नहीं है कि विश्व का हर देश, परिवार और व्यक्ति अमेरिका-इजरायल एवं ईरान युद्ध की विभीषिका से प्रभावित है, कष्ट में है और भविष्य को लेकर आशंकाओं से घिरा है। इस युद्ध ने भारत सहित विश्व के सौ से अधिक देशों को कष्टपूर्ण ढंग से प्रभावित किया है।
द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात स्थापित संयुक्त राष्ट्र (यूएन) और उसकी सुरक्षा परिषद अपना आभामंडल बहुत पहले से ही खो चुके हैं। दुनिया में मारकाट मची है, लेकिन वे कहां हैं, क्या कर रहे हैं किसी को पता नहीं। वे निस्तेज होकर कहीं पड़े हैं। जबकि उसकी शिक्षा और संस्कृति से जुड़ी संस्था यूनेस्को का सूत्र वाक्य है कि युद्ध मनुष्य के मस्तिष्क में निर्मित होते हैं। अतः शांति का संरक्षण भी वहीं से प्रारंभ होगा। बड़ी उम्मीदों से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का गठन किया गया था, परंतु अपनी श्रेष्ठता के अहंकार में डूबे पूर्व उपनिवेशवादी देशों ने अपने स्वार्थ में अंधे होकर इसे प्रभावहीन कर दिया है। साम्राज्यवाद समाप्त हो गया। उपनिवेशवाद अपने को बचा नहीं सका, लेकिन जिन्होंने केवल अन्य देशों को लूटना ही लक्ष्य बनाया था, वे आज भी अपने वर्चस्व की जकड़न से निकल नहीं पा रहे हैं, लोकतंत्र के सार-तत्व को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। कितने ही उदाहरण दिए जा सकते हैं।
मिस्र ने जब स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण किया, तब ब्रिटेन, फ्रांस और इजरायल ने उस पर चढ़ाई कर दी। इसके लिए उन्होंने तर्क दिया कि यह उनकी सुरक्षा और रणनीतिक दृष्टि से आवश्यक है, विश्व हित में भी है, लेकिन उस आक्रमण से ब्रिटेन की जो वैश्विक साख गिरी, वह आज तक भी बहाल नहीं हो पाई है। उस समय दूसरे विश्व युद्ध को समाप्त हुए केवल दस वर्ष ही हुए थे। यूएन आज के मुकाबले अधिक प्रभावशाली था। तब अमेरिका ने सुरक्षा परिषद में युद्ध विराम का प्रस्ताव पास कराया, यह आशंका व्यक्त करते हुए कि कहीं तीसरा विश्व युद्ध प्रारंभ न हो जाए। आज ट्रंप का अमेरिका खुद ही विश्व को तीसरे विश्व युद्ध की आग में झोंक रहा है। 20वीं सदी में दो विश्व युद्ध, रूसी गृहयुद्ध तथा चीनी गृहयद्ध में करोड़ों निर्दोष नागरिक और सैनिक मारे गए थे। आज भी उस विभीषिका के दोहराए जाने का भय लगातार बना हुआ है।
गत दिनों अमेरिका और इजरायल ने बिना किसी से कोई संवाद किए ईरान पर आक्रमण कर दिया। इसीलिए विश्व का कोई भी अन्य देश खुलकर उनका साथ नहीं दे रहा है। इस समय हर देश में युवा वर्ग के दृष्टिकोण में परिवर्तन हो रहा है। उसमें मानव की समानता की व्यावहारिक समझ बढ़ी है। अपने स्वार्थ के लिए शांति, समानता और राष्ट्रीय सार्वभौमिकता जैसे विचारों को तिलांजलि देने का समय अब नहीं रहा। विश्व के अन्य देशों का इस युद्ध से दूर रहना इसी बड़े ऐतिहासिक परिवर्तन को स्थापित करता है। भारतीय नेतृत्व ने इस कठिन समय में भी धैर्य का परिचय देते हुए राष्ट्रहित और जनहित को प्राथमिकता दी है। इसकी सामान्यजन में सराहना हो रही है, लेकिन इस युद्ध से आम लोगों को हो रहे कष्ट को दूर करने के लिए जरूरी है कि दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सभी पार्टियां एकजुट हों। जो केवल सरकार की आलोचना कर रहे हैं, वे कोई व्यावहारिक विकल्प प्रस्तुत करते नजर नहीं आ रहे हैं।
मनुष्यमात्र की एकता के पक्षधर समय-समय पर न केवल शांति, सहयोग और समन्वय की महती आवश्यकता का मानवहित में प्रचार-प्रसार करते रहे, बल्कि वे उसकी व्यावहारिकता भी सिद्ध करने में सफल हुए। महात्मा गांधी, मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला जैसे महापुरुषों से लोग प्रभावित हुए, उनका साथ दिया, लक्ष्य प्राप्त करने में सफलताएं भी मिलीं, लेकिन हिंसा, अविश्वास, पंथक कट्टरता, वर्चस्व की अमिट आकांक्षा कम होने के स्थान पर बढ़ती ही रही। हिंसा और युद्ध न रुके, न ही समाप्त हुए।
मानव इतिहास की यह कैसी विडंबना है कि विश्व में शिक्षा और साक्षरता का सराहनीय प्रसार हुआ है, मनुष्य की मानवीय प्रवृत्तियों की समझ भी बढ़ी है। इनके मनोवैज्ञानिक, सामाजिक पक्ष की गहराई तक शोध और अध्ययन हो चुके हैं, लेकिन मनुष्य की क्रूरता घटी नहीं, बल्कि बढ़ी ही है। शिक्षाशास्त्री मानते रहे हैं कि हर राष्ट्र का भविष्य उसके स्कूलों और अन्य शैक्षणिक संस्थाओं में लिखा जाता है। इतिहास के वर्तमान कालखंड में यह अत्यंत स्वीकार्य तथ्य लगता है। सभी वैश्विक समस्याओं का समाधान भारत की ज्ञानार्जन और उसके सदुपयोग की परंपरा में निहित हैं। भारत को ही शांति स्थापना में अपने ऐतिहासिक उत्तरदायित्व को निभाने की दीर्घकालीन रणनीति तैयार करानी होगी। अन्य कोई रास्ता नहीं है।
(लेखक एनसीईआरटी के पूर्व निदेशक हैं)










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